यादव की बातों से उन लड़कियों की जैसी छवि मेरे जेहन में बन चुकी थी, वे उससे उलट निकलीं। पता नहीं, यह उनका अभिनय था या स्वाभाविक तौर पर वे ऐसी ही थीं। शिष्ट और हँसमुख। न ज्यादा सुंदर, न ऐसी-वैसी। जाहिर है कि उन्होंने मुझे पहचाना नहीं। जब मैंने उनके पिता से अपने परिचय की बात बताई तो मुझे सम्मानपूर्वक बैठक के कमरे में ले गईं और उसी तरह मेरी आवभगत की जैसे पिता की गैर मौजूदगी में उनके किसी दोस्त की की जाती है।
वे किसी बात या अपने हाव-भाव से अशिष्ट, उद्दंड या आक्रामक नहीं लग रही थीं। मैंने यादव द्वारा बताई गई तमाम बातें दोहरा दीं और बूढ़े बाप के प्रति सयानी बेटियों के क्या कर्तव्य होते हैं, यह समझाना शुरू किया ही था, कि दोनों एकाएक गंभीर हो गईं। उनमें से बड़ी वाली बोली- 'तो पापा ने आपको भी किस्सा गढ़ के सुना दिया? ऐसा कुछ भी नहीं है।
हम तो खुद पापा की दिमागी हालत से परेशान हैं। समझ में नहीं आता, इन्हें कैसे समझाएँ? यह उम्र है शादी करने की? जो भी औरत किसी लालच में आएगी, उसकी जिंदगी भी बरबाद हो जाएगी। हम नहीं चाहतीं कि हमारे देखते किसी औरत की जिंदगी एक आदमी की सनक से बरबाद हो जाए।'
बड़ी वाली रुकी, तो छोटी वाली शुरू हो गई, 'आपको मालूम नहीं, पापा ने हमारी नाक में कैसा दम कर रखा है। सारा घर सर पर उठा लेते हैं। हर वक्त चीखते-चिल्लाते रहते हैं। उन पर शादी का ऐसा भूत सवार है, कि कई बार हमें जहर देकर मारने की धमकी दे चुके हैं।
हमारा भैया तो बहुत सीधा है। अगर हम सख्ती से पेश न आएँ, तो पापा हमें दर-दर का मोहताज बनाकर छोड़ दें। वे कहाँ-कहाँ जाते हैं, हमें सब मालूम है। हमारी मम्मी नहीं रहीं, इसका गम हमें पापा से ज्यादा है, पर नियति के आगे कोई क्या कर सकता है। पापा मम्मी पर इतने निर्भर थे, कि उसके अभाव में इनका दिमाग सनक गया है।
हमें तो इस बात की ज्यादा चिंता है कि हमारे बाद इनका क्या हाल होगा। अब देखिए ना, बिना बात के घर छोड़कर चले गए। छः दिन हो गए। लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे हैं। हम किस-किस को समझाएँ।'
वे दोनों भी बाप की तरह बातूनी निकलीं। कहाँ तो मैं उन्हें समझाने आया था और कहाँ वे मुझे दुनिया की ऊँच-नीच समझाने लगीं। मुझे लगा कि कुछ देर और इनकी बैठक में बैठा रहा तो मेरा सर घूम जाएगा। कभी लगता, बेटियाँ सही कह रही हैं।
कभी लगता, नहीं। यादव वाकई पीड़ित है। यों कोई घर नहीं छोड़ता। कभी लगता, यह पूरा घर ही असामान्य है। छोटा-सा परिवार और उसमें भी फिजूल की झिकझिक। मेरी मति मारी गई थी, कि एक घर को टूटने से बचाने के लिए चला आया। यों भी यादव से मेरा क्या सरोकार था। सिर्फ परिचय ही तो था। कभी-कभी भावुकता, संवेदनशीलता और पुण्य कमाने का लोभ मुसीबत बन जाता है।
'अच्छा। मैं तुम्हारे पापा को समझा-बुझाकर घर लाऊँगा।' मैं रुख्सत होते हुए, बल्कि उनसे निदान पाने की गरज से और क्या कहता।
'फिर आइएगा।' बेटियाँ हाथ जोड़े दरवाजे तक आई थीं। मुझे लगा, मेरी पीठ पर वे मंद-मंद मुस्करा रही हैं।
मैं जब नुक्कड़ पर पहुँचा, तो यादव चहककर बोला- 'मिल गया तुम्हें भी प्रसाद? बड़े सूरमा बनकर आए थे। भाई साहब, आप जानते नहीं हैं मेरी लाडो और गुड्डो को। अच्छे-अच्छों की यूँ छुट्टी कर दें।' उसने चुटकी बजाई।
मैं यादव को कोई जवाब दिए बगैर, अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया। वो सवालिया निगाह से वृत्तांत जानने के लिए मेरी तरफ देख रहा था। मैं उससे क्या कहता- कि मेरे लिए दोनों पक्ष अविश्वसनीय हैं। पता नहीं, इन रिश्तों का सच क्या है।
सच पूछिए तो मैं अपने आपको ठगा-सा महसूस कर रहा था। मैं हारे हुए खिलाड़ी की तरह उदासमना अपने घर की तरफ चल दिया। गाड़ी स्टार्ट करते वक्त, मैंने पलटकर एक नजर यादव पर डाली। उसका चेहरा सपाट था।
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