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प्रेम क्या होता है?
सोनू को यहाँ लड़के की देखभाल के लिए रखा गया है। वैसे वो एक निजी अस्पताल का कर्मचारी है, जिसके मालिक लड़के के पिता के करीबी दोस्त हैं। उनके ही कारण सोनू को यहाँ भेजा गया है। लड़के को दवा देना, उसे पलंग से उठाकर टहलाना, खाना खिलाना सबकी व्यवस्था सोनू को करना होती है

लड़के की माँ नहीं है, केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। इससे ज्यादा न सोनू को पता है, न ही उसको पूछने की इजाजत है। उसे बस ये पता है कि यहाँ से उसे अच्छा पैसा मिलेगा, जो कॉलेज की परीक्षा-फीस भरने में काम आ जाएगा। यहाँ पर जब तक है तब तक कविता लिखने का भी समय है उसके पास

अस्पताल की नौकरी वो केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए ही कर रहा है, मगर अस्पताल में काम करते समय कविता? सोचा ही नहीं जासकता।

'सोनू भैया', लड़के की आवाज सुनकर सोनू की तंद्रा टूटी।

'हाँ बोलो', सोनू ने कुर्सी से उठ कर पलंग की तरफ जाते हुए कहा।

'पानी चाहिए सोनू भैया' लड़के ने उत्तर दिया।

'देता हूँ, तुम लेटे रहो।' फिर घड़ी देखते हुए कहा, 'दवा लेने का टाइम भी तो हो गया है।' कहते हुए सोनू दवा निकालने लगा।

'चलो उठ कर बैठ जाओ, दवा लेना है।' सोनू के कहते ही लड़का धीरे-धीरे उठा और तकिए से टिक कर बैठ गया। दवा देने के बाद जब सोनू वापस कुर्सी पर बैठने जाने लगा तो लड़के ने कहा- 'सोनू भैया, यहीं बैठ जाओ न पलंग पर। आपसे बातें करूँगा। अब नींद तो आएगी नहीं।' लड़के के अनुरोध पर सोनू वहीं बैठ गया। पलंग के पास रखी टेबल से कंघी उठा कर लड़के के बाल ठीक करने लगा। गर्मी की मस्त हवा के कारण लड़के के बाल बिखर-बिखर जा रहे थे। शाम को नहाते समय लड़के ने जिद करके शैंपू लगाया था और देर तक नहाता रहा था।

'सोनू भैया', लड़के के सर पर गिर रही एक लट को जब वो पीछे कर रहा था, तब लड़के ने कहा। 'हूँ....' कंघी को टेबल पर रखते हुए सोनू ने। कुछ देर तक लड़का चुप रहा, फिर बोला 'ये प्रेम क्या होता है....?' लड़के के प्रश्न से सोनू कुछ चौंका। फिर मुस्कराता हुआ बोला 'प्रेम....? अभी तीन-चार साल रुक जाओ, सब पता चल जाएगा।' कहते हुए उसने लड़के के बालों को हल्के से बिखेर दिया।

'तीन-चार साल रुक पाऊँगा....?' लड़के ने उदासी से पूछा। लड़के के पूछते ही कमरे की हवा रुक गई।

'क्या होता है प्रेम सोनू भैया....?' सोनू को चुप देख लड़के ने फिर पूछा।

'प्रेम वो होता है, जो हमें किसी दूसरे से जोड़ता है।' सोनू ने कुछ टालने वाले अंदाज में कहा।

'किससे?' लड़के ने फिर पूछा।

'किसी से भी। उन सबसे, जो हमें अच्छे लगते हैं, हमारे माँ-बाप, हमारे भाई-बहन, हमारे दोस्त।' सोनू ने जवाब दिया।

'माँ तो मेरे पास नहीं है, पापा हैं पर वो भी....भाई-बहन भी नहीं हैं।' कहते-कहते लड़का फिर चुप हो गया। लड़के की आँखें अचानक नम हो गई थीं

सोनू को लगा, उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं। उसने लड़के को सहज करने के लिए कहा- 'और सबसे खास प्रेम हमें किसी एक खास से भी होता है।' सोनू के इतना कहते ही लड़के के चेहरे के भाव अचानक बदल गए, मानो सोनू ने उसके मन की बात कह दी हो।

'कौन खास सोनू भैया....?' उसने उत्सुकता से पूछा।

'ये जो बाहर चाँद नजर आ रहा है, न आधा अधूरा-सा चाँद, इसको देखकर न तो रात की रानी के फूल झूम रहे हैं, न पेड़ों की पत्तियाँ इठला रही हैं, क्योंकि ये सब एक खास चाँद से प्रेम करते हैं। पूर्णमासी के पूरे चाँद से। अभी दो दिन बाद जब ये चाँद पूरा हो जाएगा, तब ये सब उस खास के प्रेम में पागल हो जाएँगे।' सोनू ने उत्तर दिया।

'सचमुच....?' लड़के ने उत्सकुता से फिर पूछा।

'हाँ बिलकुल' सोनू ने कहा

'दिखाओगे मुझे?' लड़के ने पूछा।

'हाँ बिलकुल दिखाऊँगा।' सोनू ने उत्तर दिया।

लड़का गौर से खिड़की के पार के चाँद को देखने लगा। उसके चेहरे के भाव पल-पल बदल रहे थे। कुछ देर तक देखते रहने के बाद लड़का फिर उदास हो गया।

'तुम्हें मिला कोई खास....?' सोनू ने लड़के का मूड बदलने के लिए पूछा।

लड़के ने सोनू की तरफ देखा। सोनू ने देखा, उन दो नन्ही आँखों में सितारे झिलमिला रहे थे। फिर अचानक वो शरमा गया और चादर के धागे खींचने लगा।

'हूँ....मतलब मिली है।' सोनू ने मजाक के अंदाज में पूछा।

'है नहीं, थी....।' लड़के ने उसी तरह झुके हुए कहा, पर उसकी आवाज डूबी हुई थी।

'ब?' सोनू ने पूछा।

'जब मैं स्कूल जाता था....' लड़के के स्वर में उदासी थी। उसकी आवाज ऐसी थी, मानो किसी सुनसान रात में पहाड़ पर लगे पेड़ों पर बर्फ गिर रही हो।

'कौन थी....?' सोनू ने फिर पूछा।

'मेरे साथ ही पढ़ती थी और मेरे साथ वही होता था, जो अभी आपने कहा ना कि पूर्णमासी के चाँद को देखकर पेड़ों को हो जाता है।' लड़के ने धीरे से कहा।

'हूँ....खूब बात-वात होती होंगी तब तो उससे?' सोनू ने शरारत के लहजे में पूछा।
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