- पंकज सुबीर 'माँ तो मेरे पास नहीं है, पापा हैं पर वो भी....भाई-बहन भी नहीं हैं।' कहते-कहते लड़का फिर चुप हो गया। लड़के की आँखें अचानक नम हो गई थीं। सोनू को लगा, उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं। उसने लड़के को सहज करने के लिए कहा- 'और सबसे खास प्रेम हमें किसी एक खास से भी होता है।'
खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी-सी रात। खिड़की से सटकर लगी हुई रातरानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध, खिड़की के परदे से अठखेलियाँ कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है। खिड़की के छज्जे पर लदी हुई रंगून क्रीपर कीलता भी लाल सफेद और गुलाबी फूलों के गुच्छों के कारण झुकी-झुकी जा रही है।
खिड़की के पार दूर आसमान में आधा-अधूरा चाँद टँका हुआ है। ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं को रात की ठंडी हवा सहला रही है। हवा का स्पर्श पाकर पत्तियाँ कृतज्ञतावश झुकी-झुकी जा रही हैं। गर्मी के मौसम की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रात होती है। जितना तपता हुआ, जलता हुआ दिन, उतनी ही सुहानी रात। | | लड़के की माँ नहीं है, केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। इससे ज्यादा न सोनू को पता है, न ही उसको पूछने की इजाजत है। उसे बस ये पता है कि यहाँ से उसे अच्छा पैसा मिलेगा, जो कॉलेज की परीक्षा-फीस भरने में काम आ जाएगा। |
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खिड़की से हट कर सोनू अंदर आ गया और अपनी कविता की डायरी ले कर कुर्सी पर बैठ गया। लड़का अभी भी उसी प्रकार सो रहा है। सोनू गौर से उस लड़के के चेहरे को देखने लगा। चौदह-पंद्रह वर्ष की मासूमियत से भरा हुआ चेहरा, जिस पर जवानी ने होठों के ऊपर कल्ले की तरह फूट रहे मूँछों के बारीक-बारीक रोम के रूप में, अभी दस्तक देना प्रारंभ ही किया है।
गुलाबी होंठ, जिनको बीमारी ने भले ही सुखा दिया है, मगर अभी भी उनमें ताजगी है। बीमारी के बाद भी चेहरे पर किशोरावस्था की चमक और स्निग्धता बिखरी है।
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