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क्रांतिदृष्टा मैक्सिम गोर्की
- डॉ. कृष्ण कमलेश

असमर्थ युग के समर्थ लेखक के रूप में मैक्सिम गोर्की को जितना सम्मान, कीर्ति और प्रसिद्धि मिली, उतनी शायद ही किसी अन्य लेखक को अपने जीवन में मिली होगी। वे क्रांतिदृष्टा और युगदृष्टा साहित्यकार थे। जन्म के समय अपनी पहली चीख के बारे में स्वयं गोर्की ने लिखा है- 'मुझे पूरा यकीन है कि वह घृणा और विरोध की चीख रही होगी।'

इस पहली चीख की घटना 1868 ई. की 28 मार्च की 2 बजे रात की है लेकिन घृणा और विरोध की यह चीख आज इतने वर्ष बाद भी सुनाई दे रही है। यह आज का कड़वा सच है और गोर्की का शाब्दिक अर्थ और कड़वा है। नोजनी नोवगोद ही नहीं विश्व का प्रत्येक नगर उनकी उस चीख से अवगत हो गया है।

अल्योशा मैक्सिम मेविच पेशकोफ मैक्सिम गोर्की पीड़ा और संघर्ष की विरासत लेकर पैदा हुए। उनके पिता लकड़ी के संदूक बनाया करते थे और माँ ने अपने माता-पिता की इच्छा के प्रतिकूल विवाह किया था, किंतु मैक्सिम गोर्की सात वर्ष की आयु में अनाथ हो गए। उनकी 'शैलकश' और अन्य कृतियों में वोल्गा का जो संजीव चित्रण है, उसका कारण यही है कि माँ की ममता की लहरों से वंचित गोर्की वोल्गा की लहरों पर ही बचपन से संरक्षणप्राप्त करते रहे।

साम्यवाद एवं आदर्शोन्मुख यथार्थभाव के प्रस्तोता मैक्सिम गोर्की त्याग, साहस एवं सृजन क्षमता के जीवंत प्रतीक थे। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि व्यक्ति को उसकी उत्पादन क्षमता के अनुसार जीविकोपार्जन के लिए श्रम का अवसर दिया जाना चाहिए एवं उसकी पारिवारिक समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वेतन या वस्तुएँ मिलना चाहिए। कालांतर में यही तथ्य समाजवाद का सिद्धांत बन गया। गोर्की का विश्वास वर्गहीन समाज में था एवं इस उद्देश्य- पूर्ति के लिए वे रक्तमयी क्रांति को भी उचित समझते थे।
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