मंच अपना | व्यंग्य | पत्रिकाएँ | पुस्तक-समीक्षा | मील के पत्थर | आलेख | संस्मरण | हरिवंशराय बच्चन | कथा-सागर | काव्य-संसार | मुलाकात | नीरज | विजयशंकर की कविताएँ | संगत
मुख पृष्ठ » विविध » साहित्य » काव्य-संसार » काल, तुझसे होड़ है मेरी (Shamsher Bahadur Singh-Poem)
Bookmark and Share Feedback Print
 
Shamsher Bahadur Singh-Poem
ND
काल,
तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू-
तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।

इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो-

कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं- तेरे भी, ओ' 'काल' ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !
जो मैं हूँ-
शमशेर जन्मशती
ND
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियाँ, कम्यून,
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।
मैं, जो वह हरेक हूँ
जो, तुझसे, ओ काल, परे है...
काल, तुझसे होड़ है मेरी।

('काल तुझसे होड़ है मेरी' कविता-संग्रह से)
संबंधित जानकारी खोजें