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सुशील शुक्ल
काव्य-संसार
ND
मैंने सारी उम्र गलाकर
पत्तों से कुछ शिद्दत लेकर
शाखों से कुछ ख्वाब मँगाकर
थोड़े से दिन ढाले हैं।

आना, जरा देखना
क्या मेरे इक भी दिन का चेहरा
उसकी आँखें या कि माथा या फिर ठुड्डी
या कम से कम कोई तिल ही
यार तुम्हारे किसी रोज से मिलता है।
सौजन्य से - नया ज्ञानोदय
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