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प्रज्ञा रावत
काव्य-संसार
ND
शोरगुल से भरी
बजबजाते रिश्तों के
तानों-बानों में उलझी
लगभग बदसूरत-सी
होती जाती दुनिया में
इतनी गुज़र-बसर है इन दिनों
कि उकताने लगती हूँ

हरदम एक अहसास पीछा करता है कि
कभी कोई तो आवाज आए मुझ तक
जिसका नाम आवाज ना हो
और समा जाए मेरे भीतर कोई हवा
निर्बाध!
उड़ा ले जाए जबर्दस्ती
इस जगह से
जहाँ भागते-भागते लगभग
मरने लगी हूँ
यकीन मानों कुछ देर ही सही
उड़ जाऊँगी मैं,

ये क्या जिंदगी से कुछ ज्यादा माँगना हु्आ?
सौजन्य से - नया ज्ञानोदय
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