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मुख पृष्ठ » विविध » साहित्य » काव्य-संसार » महामिलन की प्रतीक्षा में बैठा चाँद (Poem)
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रमेश प्रजापति
poem
ND
पहाड़ के कन्धे पर बैठा
चाँद गवाह है
हमारी मुलाकातों का
शहर के कोलाहल से दूर
जब बैठकर निर्जन में
बुनते थे हम
भविष्य के सपने।

यह वही दूज का चाँद है
जो चमक रहा है
मजदूर की दराँती-सा
ठीक ईद से पहली साँस में
खुशियों का प्रतीक बनकर ।

मेरी आँखों से ओझल हो
कौन से देश में चुपचाप
तुम्हारी आँखों के
उजले फूल झरते हैं
तुमने अपनी हर एक स्मृतियों को
घनीभूत कर दिया मेरी शिराओं में
ईद के चाँद की तरह भी
नहीं देख पा रहा हूँ तुम्हें
अपने एकांत में।

हमारा संबंध तो
उन अमिट संबंधों की तरह था
जो प्रकृति ने दिए हैं हमें
उपहार में
जिसे महसूस किया था हमने पल-पल।

ओ मेरी प्रेयसी!
आओ,
मेरे एकांत में लहरा दो
अपना दुपट्टा
जीवन के सभी रास्ते हो गए अवरूद्ध
तुम्हारी हँसी बिना
सूनी है घाटियाँ,
तुम्हारे केशों बिना
उतरा हुआ है बादलों का चेहरा
तुम्हारी आँखों के बिना
सूने हो गए हैं झील के कमल।

दुनिया आज भी रोज
पहले की तरह
बनती और बिगड़ती है
तारे आज भी झरते हैं
धरती के आँचल में
प्रेम उमड़ता है मेरी रगों में
उदास है -
सोनजूही,
जंगल, नदी
वसंत की रात का चाँद।

poem
WD
आओ,
सहेजकर रखे हुए हैं मैंने
अभी तक यादों के सारे मौसम
यह चाँद आज भी
पहाड़ के कन्धे पर बैठा
दूर रखना चाहता है
काली रात को
दु:स्वप्नों की परछाईं से
हमारे महामिलन की प्रतीक्षा में।
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