तुम्हारी शाश्वत उपस्थिति

ओमप्रकाश मिश्र एक दिन हम भी देखेंगे फूलों की मुस्कान धरती-चाँद को बातें करते नदी की धारा के संग यात्राएँ करती चंचल इच्छाएँ छतनार वृक्ष पर सुस्ताती धूप अल्हड़ बालिका-सी उछलती-कूदती दुपहरी आहर किनारे ध्यानमग्न बगुला पीपल की पत्तियों को सहलाती मन्द हवाएँ ह्रदय की देहरी पर तुम्हारा अनिंद्य सौन्दर्य तिल-तिल क्षर होते जीवन में तुम्हारी शाश्वत उपस्थिति। सौजन्य से - नया ज्ञानोदय
संबंधित जानकारी खोजें
यह भी खोजें:
धरती, चाँद, फूल, नदी, साहित्य, कविता, काव्यसंसार, ग़ज़ल, नज़्म तुम, प्रेम, याद, मंजिल, ज़िंदगी, साहित्य रोमांस, प्रेम कविता, प्रेम गीत, इश्क, मोहब्बत, अनुराग, प्यार, लव, चाँद, सूर्य