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सतपाल ख़या
ghazal
SUNDAY MAGAZINE
तुझे ज़िंदगी यूँ बिता कर चले
कि पलकों से अंगार उठा कर चले,

चले जब भी तन्हा अँधेरे में हम
तो मुट्ठी में जुगनू छुपा कर चले,

ग़ज़ल की भला क्या करूँ सिफ़त मैं
ये क़ूचे में दरिया उठा कर चले,

हर एक मोड़ पर थी बदी दोस्तों
चले जब भी दामन बचा कर चले,

कभी दोस्ती और कभी दुश्मनी
निभी हमसे जितनी निभा कर चले,

चले कर्ज़ लेकर कई सर पे हम
कई कर्ज़ थे जो अदा कर चले,

हमीं थे जो इक दिलशिकन यार को
नज़र में सभी की खु़दा कर चले,

हुई दुश्मनी की 'खयाल' इंतिहा
मेरी खाक भी तुम उड़ा कर चले।
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