मुख पृष्ठ > विविध > साहित्य > काव्य-संसार > वतन के दुख भरे हालात हैं
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
वतन के दुख भरे हालात हैं
रोहित जै
NDND
आँख में आँसू भरे हैं दिल में ये जज़्बात हैं
क्यों मेरे प्यारे वतन के दुख भरे हालात हैं

कोई कुछ करता नहीं है कोई कुछ कहता नहीं
क्यों ये सन्नाटा निहाँ है ये भी कोई बात है

भीख माँगें औरतें, बच्चे सड़क पर सो रहें
क्या यही जमहूरियत की मुल्क़ को सौग़ात है

सीने छलनी हैं ज़मीं के फ़िज़ाँ लहूलूहान है
आसमानों से मुसलसल खून की बरसात है

जल रही हैं बस्तियाँ ड़ूबी हुई हैं कश्तियाँ
जिस तरफ़ देखो यहाँ फ़ैले हुए ज़ुल्मात हैं

ज़िन्दा लाशें चल रही हैं और सुलगते हैं बदन
कौन बोलेगा यहाँ ये आदमी की जात है

आदमीयत ज़ुल्म की चक्की में पिसती जा रही
अपनी खबर मिलती नहीं दुनिया की क्या औक़ात है

NDND
जिस तरफ़ देखो गुनहगारों की महफ़िल है जमा
आह मौसीक़ी बनी है अश्क़ के नग़मात हैं

इक अंधेरा सा उतरता है दिलों तक आँख से
अब सहर होती नहीं है सिर्फ़ छाई रात है

झोंपड़ों गलियों बियाबानों में दरियाओं में खून
पुरसुकूँ दैरो हरम तक में यही हालात हैं

NDND
खून से रंगीं फ़िज़ाएँ खून-बू लाती हवा
सुर्ख़ नदियाँ हैं यहाँ पर सुर्ख़ हर निशात है

खून उबलेगा नहीं तो खून टपकेगा तेरा
अब तो यल्ग़ारे बगावत से ही बननी बात है

किस कदर बेशर्म बैठे हैं ये सारे आदमी
क्या दिले 'रोहित' में ही बस ऐसे अहसासात हैं?
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
एक आईना था मेरे साथ
अछूत बनाम अछूती
सूर्ख गुलाब के पीले पराग की तरह
हाँ पापा, मैंने प्यार किया था
अग्नि-परीक्षा
हमेशा मेरे साथ रहे पापा