ज्योति जैन ये रही तुम्हारी लक्ष्मण-रेखा धनुष की प्रत्यंचा के समान स्वर खिंचा और जो इसे पार करके देखा तो समझो देनी पड़ेगी अग्निपरीक्षा। वाह रे आधुनिक मर्यादा पुरूषोत्तम तुम्ही हो आज के राम-लक्ष्मण? कहाँ चला जाता है वह पौरूष तुम्हारा, जब करते हो स्वयं नारी का मान हरण? क्या हो तुम पितृवचन के रखवाले, या हो फिर एक पत्नी व्रत वाले? यदि साहस रखते हो भोगने का वनवास तभी करो मुझसे सीता बनने की आस ! |