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टुकड़े-टुकड़े दिन बीता
मीनाकुमारी
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टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, जहर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दी दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते-आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली।
और भी
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
दस्तूर के मुताबिक
तुम्हीं हो डोर बिटिया
एक दिन आएगा
एहसास पर पहरा है लोगों
प्रारब्ध नए युग का