मुख पृष्ठ > विविध > साहित्य > काव्य-संसार > रात की स्मृति में दिन है
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
रात की स्मृति में दिन है
- राजकुमार कुंभज
ND

रात की स्मृति में दिन है
जैसे कि एक ऐनक भी हुआ करती थी कभी
देखने, पढ़ने और समझने के लिए
अब के समय में दीवार पर टँगी है जो घड़ी
बंद है धड़कन उसकी
कुछ-कुछ परिचित, कुछ-कुछ अपरिचित
ऊँची चट्‍टान से खिसकते किसी कंकर जैसा
रात की स्मृति में दिन है।
और भी
एहसास...
भीड़ में कुछ तनहा हूँ...
उस की तस्वीर जल गई होगी
पं. माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी रचनाएँ
कागज की नाव...
जो हरा नहीं है