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नीरज
नीरज
26
अप्रैल
2008
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गीत
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अभी न जाओ प्राण ! ......
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मगर निठुर न तुम रुके.....
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नारी .....
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यदि मैं होता घन सावन का ....
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अंतिम बूँद...
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निभाना ही कठिन है ......
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बहार आई....
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नींद भी मेरे नयन की...
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पाती तक न पठाई
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धर्म है...
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धनियों के तो धन हैं लाखों
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प्यार न होगा...
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मुझे न करना याद...
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'कवि मंच अब कपि मंच बन गया है'
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कारवाँ गुजर गया...!
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