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नीरज
19 अप्रैल 2008 
अब तुम रूठो....
किसलिए आऊं तुम्हारे द्वार ?
तब मेरी पीड़ा अकुलाई!
पिया दूर है न पास है
दिया जलता रहा....
मुस्कुराकर चल मुसाफिर...
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