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नीरज
17 जनवरी 2008 
दोहे
उनकी याद हमें आती है
सारा जग मधुबन लगता है
मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ
सारा जग बंजारा होता
विश्व चाहे या न चाहे
कितने दिन चलेगा?
दीया जलता रहा
अब तुम्हारा प्यार भी
जीवन जहाँ
कितनी अतृप्ति है
तुमने कितनी निर्दयता की
नींद भी मेरे नयन
मानव कवि बन जाता है
खग उड़ते रहना जीवन भर
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था
तुम दिवाली बन कर
तिमिर ढलेगा
मेरा गीत दीया बन जाए
अँधियार ढलकर ही रहेगा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
पीर मेरी, प्यार बन जा !
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
कारँवा गुज़र गया
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना