वे युवा हैं। हैंडसम हैं। मखमली आवाज के धनी हैं। चाहते तो इंजीनियरिंग में कैरियर बना सकते थे, एकदम चमकीला। लेकिन यह राह बीच में ही छोड़ी और सुर की उजली राह पकड़ी। कैंसर से पिता की मृत्यु हुई तो माँ ने हिम्मत बढा़ई। धीरे-धीरे सारेगामापा से होते हुए आलाप लिया और विलंबित से फिर द्रुत पर। रागों को जाना-समझा और गुरुओं की छाया में बैठकर गाया। इस तरह जीवन सुरीला बना लिया। यह कहानी है पुणे के युवा शास्त्रीय गायक पुष्कर लेले की। अगले बाल दिवस पर वे तीस के हो जाएँगे। उनकी इस कहानी में भी राग की तरह उतार-चढ़ाव हैं। कोमल और तीव्र स्वर हैं। लेकिन इस बातचीत के वक्त उनके दिल-दिमाग में कोमल और मधुर स्वर हैं। मैंने उनसे कहा कि हम सुरीले फिल्म और फिल्मी संगीत पर बात करेंगे, शास्त्रीय संगीत पर नहीं। वे राजी हुए और बहने लगे। वे इंदौर में श्रुति-संवाद संस्था के बुलावे पर आए थे। वे कहते हैं कि ए.आर. रहमान का संगीत दिल को छूता है। उसमें गजब की मेलोडी है। वह नदियों और झरनों की तरह बहता संगीत है। खासकर रोजा और बाम्बे का गींत-संगीत। स्लमडॉग मिलिनियेर का संगीत रिदम बेस्ड है। उसमें रिदम ज्यादा है मेलोडी कम है। इस फिल्म के लिए उन्हें ऑस्कर मिला लेकिन इसका संगीत मुझे इतना पसंद नहीं। ऑस्कर के अपने अलग मापदंड होते हैं। उनका पहले का संगीत स्लमडॉग से कई गुना बेहतर है। जब से रहमान को इंटरनेशनल एक्सपोजर मिला है उनका संगीत मेलोडी से रिदम की तरफ झुका है। इस रिदम पर युवाओं के पैर आसानी से थिरकने लगते हैं। उसकी बीट्स युवाओं को लुभाती है। पुणे में जो उनकी लाइव कंसर्ट हुए इसमें भी उन्होंने वे गीत प्रस्तुत किए जिसमें रिदम और बीट्स थी। विजय सरदेशमुख और सत्यशील देशपांडे से संगीत की तालीम हासिल करने वाले पुष्कर कहते हैं एक अच्छी बात ये हुई है कि संगीत में सारी हदें टूट गई हैं। अब कोई घेरेबंदी नहीं है। रहमान ने कई तरह के संगीत की खूबियों का इस्तेमाल किया है। वेस्टर्न से लेकर इंडियन क्लासिकल और अरबी संगीत तक का इस्तेमाल किया है। शास्त्रीय संगीत में कट्टरपन कम हुआ है और घरानेदार गायकी बदल रही है। पहले तो इतनी कट्टरता थी कि एक घराने का उस्ताद अपने शिष्यों को दूसरे घराने के उस्ताद का गायन सुनने नहीं देता था। |