* आपकी मुख्य विधा क्या है अर्थात स्वयं को आप किसी विधा में अधिक सहज पाते हैं? - मैं लेखन को शब्दों की आराधना मानता हूँ इसी वजह से अपनी अभिव्यक्ति के लिए मैंने किसी विधा-विशेष की बागड़बंधी नहीं की, बावजूद इसके कहानी या लघुकथा के कैनवास पर अक्षरों के रंग भरने में मुझे अच्छा लगता है।
* सृजन के प्रेरणा बीज आप कहाँ से प्राप्त करते हैं? - अपने ही आसपास का जीवन, उससे जुड़े लोग, देखे-सोचे अप्रत्याशित अनुभव, कोई विशेष घटना या प्रसंग मुझे लिखने के लिए मजबूर करते हैं। कोशिश यह रहती है कि लेखन के केंद्र में कमजोरियाँ, अच्छाई, विवेक, चालाकी, चतुरता के माध्यम से अपनी पहचान देने वाला मनुष्य और उसका जीवन हो।
* आपकी नजर में श्रेष्ठ साहित्य क्या है? - अपने इर्द-गिर्द जहाँ कहीं भी ऐसा कुछ घटित हो रहा है जो मानवीय मूल्यों या मनुष्यता से परे है उसकी तस्वीर सामने लाकर, बेहतर जिंदगी जीने के लिए संघर्षरत व्यक्ति की लड़ाई में संवेदनात्मक-स्तर पर अपनी भागीदारी साबित कर सके।
* समकालीन कहानी में संप्रेषणीयता विलुप्त हो रही है? - लेखन चाहे कहानी, कविता, किसी भी विधा या शैली में हो, संप्रेषणीयता इसकी पहली शर्त है। इसके बाधित होने संबंधी प्रश्न तब उठते हैं जब रचना रचनाकार तक सीमित होकर प्रयोगधर्मी हो जाती है। कहानी चूँकि जीवन की व्याख्या से सीधे जुड़ी होती है, इसलिए सुलझे हुए कथाकार प्राय: इस कूपमंडूक प्रवृत्ति से अपने को बचाने की कोशिश करते हैं।
* पात्रों की निराशा और मनोवैज्ञानिक दुर्बलताओं को सहज स्वीकारने के पीछे क्या कारण हो सकता है? - उम्र के हर पड़ाव पर व्यक्ति संघर्ष से जूझता है। संघर्ष-चेतना उसे आंतरिक-शक्ति से मिलती है। जीवन में प्राय: ऐसे अवसर आते हैं, जब अंतर्निहित सक्रिय ऊर्जा पर निराशा और दुर्बलता की परत हावी हो जाती है। कहानी इस परत की व्याख्या कथ्य और पात्र के माध्यम से करती है। चूँकि पाठक भी प्राय: ऐसी मनोग्रंथियों से ग्रस्त होता है, इसी वजह से वह इसे सहज ग्राह्य कर लेता है।
* समूचा साहित्य परिधियाँ तोड़ने को व्यग्र नजर आ रहा है? यह समय की जरूरत है या हम ही भ्रम में जी रहे हैं? * जब सृजन में सामाजिक मूल्यों को अनदेखा कर दिया जाता है, तब आक्रोश जनित इस प्रकार की चिंताओं का उठना स्वाभाविक है। पर निश्चित मानिए साहित्य कभी मूल्यों की परिधियाँ तोड़ने या अपनी छवि भंग करने का आग्रह नहीं करता।
* 'साहित्य में समाज' और 'समाज से उपजा साहित्य' एक समाजशास्त्री की नजर से क्या भिन्नता पाते हैं, आप इन दोनों में? - पहली स्थिति में सृजन-प्रक्रिया लेखक से समाज की ओर होती है जबकि दूसरी में समाज से लेखक की ओर। ये दोनों समाज और साहित्य के अंतर्सबंधों को महीन सूत से बाँधने वाली वे स्थितियाँ हैं जो साहित्य को समाज का प्रतिबिंब ही नहीं नियामक तथा उन्नायक भी घोषित करती हैं।
इन्हीं के तहत समाज, साहित्य से बदलाव के लिए आगाज करता है और साहित्य, अपने आईने में समाज को उसका चेहरा दिखाता है। |