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व्यंग्य
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वॉट एन आईडिया भेनजी!
राज्य में बच्चा-बच्चा कहता है कि सच में भेन जी का कोई जवाब नहीं है। वहाँ चाकू भी वही हैं,फल भी वही हैं। समस्या भी वही हैं,हल भी वही हैं। आज भी वही हैं,कल भी वही हैं।ऐसे ही राजभवन की एक उबाऊ-सी सुबह। विदाउट एक्साइटमेंट! रात भर विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों,समस्याधारकों से त्रस्त,थकी भेन जी जब सुबह अलसाई-सी उठीं तो प्रातः स्मरणीया को देख एक भावुक दरबारी बोल पड़ा,'क्या बात है मैम?
आलेख
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अपना मूल्यांकन करें लेखक संगठन
विचार करने की बात है कि लेखक संघों को भी इसी तरह चुस्त-दुरुस्त होना चाहिए और वर्तमान कठिन समय में लेखक का कवच-कुंडल बन जाना चाहिए। अतः लेखक संघों की जरूरत बनी रहेगी।
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काव्य संसार
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नहीं भूला मैं नानी माँ का गाँव
आज भी नहीं भूला हूँ मैं नानी माँ का गाँव। कितना सुखद था वो मेरा बचपन का पड़ाव। शहर में सारी सुख-सुविधाएँ फिर भी नहीं सुकून, ग्राम्य जीवन था दुष्कर पर नहीं था वहाँ तनाव॥ थी वो कच्ची हवेली जहाँ पर मैंने आँखें खोली। मेरी प्यारी नानी थी वो अति सीधी और भोली। बहुत मिली मुझको उनकी ममता पूरित छाँव। आज भी नहीं भूला हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥ याद है मुझको सागौर गाँव का वो पुरबिया....
• डोरिस लेसिंग संग बिताए लम्हे • स्त्री प्यार देती है
• किसी लेखक संगठन का टूटना • ‍सखी, तुम गगन में धीरे-धीरे
• लेखक संगठन की ऐतिहासिक अनिवार्यता • भव्यता का प्रतीक मानी जाती थी पेंसिल