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क्षतशीश किन्तु नतशीश नहीं
बच्चन जी बैंकुठपुर में
वासना, दैहिकता, पार्थिवता उनके लिए त्याज्य नहीं थी। तन्मयता, आसक्ति, इहलौकिकता, आमुष्मिकता, उद्दामता, यहाँ और अभी का भाव उनकी कविता के सारतत्व हैं। उन्होंने तभी तो लिखा जब उन्हें अपने भीतर धुआँ-धुआँ-सा उठता दिखाई दिया था। वे अपने जीवन का भार ही अपनी कविता में व्यक्त नहीं कर रहे थे, उस समय की मानसिकता और जनजीवन का भार भी उनकी कविता में व्यक्त हो रहा था। जब वे लिखते थे तो उनकी हस्तलिपि जैसे सब-कुछ को समेटती चलती थी, जब वे कविता पाठ करते थे- दोनों हाथ फैलाकर- तब जैसे उनके फैले हुए हाथ अपने सामने के सब-कुछ को अपने पास खींचते से लगते थे।

किन्तु उनके नाम की और उनके हस्ताक्षर की यह व्याख्या तो बाद में समझ में आई, उस समय यही लगा कि कवि ने अपने पर रीझ कर अपनी कविता को स्वयं ही गुड कहा है। बच्चनजी के हस्ताक्षर हम लोगों को उस समय गुड जैसे ही लगते थे। हमें लगा था कि हस्ताक्षर के अंत में जो खड़ी पाई नीचे की ओर आती है वह अपने हस्ताक्षरों को कलात्मक बनाने की, उसे रेखांकित करने की ही चेष्टा है। लोग अपने हस्ताक्षरों की शैली के नीचे लकीरें खींचते हैं, यह कवि अपने हस्ताक्षरों के आगे लकीर खींचता है। मैं और मेरे बहुत से समव्यस्क कवि मित्र उन दिनों आत्ममुग्धता में अपनी बचकानी कविताओं के नीचे बच्चन के हस्ताक्षरों की शैली में गुड लिख दिया करते थे। कभी-कभी गुड के पहले 'वी' भी लगा देते थे।

वेरी गुड के भाव से- यह मानकर कि बच्चन की अपनी शालीनता में, अपनी विनम्रता में, अपनी कविता को केवल गुड कहना यथेष्ट मानते हैं, उसे वेरी गुड कहना उन्हें अतिरंजना लगती होगी। निज कवित्त केहि लागिन नीका में तुलसीदास जैसे महाकवि ने अपनी कविता को केवल नीका कहा है, अति नीका नहीं। यह सोचकर अब बड़ी हँसी आती है कि 'कृष्ण कांति जीतू मिलकर करने लगे विचार, पके-पके ये आम लगे हैं कैसे पावें यार' जैसी अपनी बाल तुकबंदियों के नीचे कैसे वेरी गुड लिख दिया करता था।

आज, 45 वर्षों के अपने महाविद्यालयीन और विश्वविद्यालयीन अध्यापकीय अनुभव के बाद, मुझे बच्चनजी के काव्य को कोई रिमार्क देना हो तो वह होगा 'वेरी गुड'।

गुड या वेरी गुड, कविता वही होती है जो जीवन के आवर्त्त को व्यक्त करने में समर्थ हो। प्रसिद्ध सूफी शायर हफीज ने अपनी प्रेयसी से कहा था कि मैंने रोजे अजल को जो इकरारनामा तेरी जुल्फें-पेंचा से किया था, उसी से बँधा हूँ और निकल नहीं सकता। बच्चन के प्रिय कवि और उनके शोध विषय ईट्स नेहफीज के इस कथन से अपने उस काव्य सिद्धांत के लिए बल संचित किया था कि कवि का क्षेत्र जीवन का आवर्त्त है, घेरा, वृत्त- प्रतीक रूप में प्रेयसी की जुल्फे पेंचा- छल्लेदार कुंतलराशि, घूम-घामकर उसी जगह आ जाए। जहाँ से वह चली थी।

बुंदलेखंड में एक साँप होता है दो मुँहा- कचलेंड या चकलेंड- अँग्रेजी का एरिक्स-जो अपने मुँह से अपनी पूछ दबाए रहता है। बच्चनजी ने ललितापुर में बिताए दिनों में यह साँप देखा होगा। एक लता भी होती है इश्क पेंचा-गोल-गोल घूमकर बढ़ने वाली- बारीक लाल-लाल फूलों वाली- दूर से चित्त को मोहने वाली। बच्चनजी ने अपने हस्ताक्षरों को आइडिया हफीज के जुल्फे-पेंचा से लिया था या कचलेंड से या इश्क पेंचा से- पता नहीं पर उन्होंने अपनी कविता में, अपने व्यक्तित्व में, अपने दस्तखतों में, अपने बढ़े हुए घुँघराले बालों में दार्शनिक का पथ नहीं अपनाया, कवि का मार्ग अपनाया था।
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