यह गहरा सच परदेस के पेड़ भीतर तक महसूस करते हुए भी अभिव्यक्ति का जोखिम नहीं उठा पाते जिसे लेखक ने संवेदना और संवाद के संयोजन से पन्नों पर सजा दिया। उपाध्यायजी की लेखनी का करिश्मा है कि पहले निबंध की पहली पंक्ति ही पाठक को इस कदर बाँध लेती है कि उन्हें पढ़ते रहने की प्यास हर निबंध के साथ बढ़ती जाती है।
लेखक सिर्फ 'प्यास' का बोध ही नहीं कराते बल्कि 'झरना' भी उपलब्ध कराते हैं। उन्हें पढ़ते हुए लगता है भीतर ही भीतर एक सच्चा और भोला मन, जो जीवन की आपाधापी में कहीं झुलस गया है। वह फिर जन्म ले रहा है।
परदेस में मानवीय रिश्तों की पड़ताल करते हुए वे एक निबंध में लिखते हैं - 'यहाँ सुविधाओं के लिहाज से सुख और दु:ख हैं जबकि हमारे यहाँ सुख और दु:ख को परिभाषित करने के लिए सुविधाएँ एकमात्र पैमाना नहीं है।
यहाँ उस भाव-आकुलता का अभाव है। ऐसी आकुलता जो रिश्तों को मजबूती से जोड़ती है। यहाँ (ऑस्ट्रेलिया में) रिश्ते तो हैं, लेकिन वे ऐसी संवेदनशीलता की रस्सी से बँधे हैं जो बार-बार टूटती है। ...और इसे जोड़ने के जतन नहीं होते। यह टूटी हुई रस्सी अपने पहले सिरे से जुड़ने का यत्न नहीं करती। नए सिरे ढूँढती है। नए सिरों से जुड़ती है, फिर टूटती है।'
आत्मीयता और परदेस की पीड़ा की नर्म-नर्म आँच में रचे-पके ये ललित निबंध एक अनूठे संतोष का अनुभव कराते हैं। हर उस पाठक को पुस्तक अवश्य पढ़ना चाहिए जो 'परदेस' के 'पेड़' हो गए हैं।
पुस्तक - परदेस के पेड़ लेखक - नर्मदा प्रसाद उपाध्याय प्रकाशक - प्रवीण प्रकाशन मूल्य - 150/-
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