महान पिता की महान विरासत का अधिकार 'आठ नं.' से पहले 'छोटे गाँधी', 'अब्दुल्ला' और 'हरिलाल' के रूप में अपनी पहचान तलाशता रहा, पर 'उजाले' के सामने सदैव 'परछाई' ही बना रहा।
हरिलाल का भोला मन अपने पिता के प्रति असीम सम्मान से भरा था। उसका 'दोष' सिर्फ और सिर्फ इतना था कि उसने सपना देखा विलायत जाकर बेरिस्टर बनना है फिर बापू की तरह देशसेवा में लग जाना है। सबसे पहले उसका सपना चटकता है जब बापू के मित्र डॉ. मेहता उसकी विलायत शिक्षा का खर्च उठाने को तैयार होते हैं लेकिन बापू इस पेशकश को ठुकरा देते हैं। यह कहकर कि मेरी सेवा के बदले मेरे परिवार को लाभ नहीं मिलना चाहिए। किशोर आँखें तब और सुर्ख हो जाती हैं जब आश्रमवासी सोराबजी और छगनलाल को यह मौका मिलता है और उसे सिर्फ इसलिए नहीं कि वह एक महान पिता की संतान है! यही नहीं सामान्य शिक्षा से भी हरिलाल और उसके भाइयों मणिलाल, रामदास, देवदास को इसलिए वंचित रखा जाता है क्योंकि बापू की नजर में चरित्र की रक्षा और जीवन मूल्य बनाए रखने की शिक्षा के समक्ष वह शिक्षा निरर्थक है जो विदेशियों ने निर्धारित की है। हरिलाल की आँखों का उजला सपना कसैले विद्रोह में तब्दील होने लगता है।
पुस्तक हर गाँधीवादी पढ़ें और गाँधी विरोधी भी। इसलिए कि आदर्श और सिद्धांत छपवा लेने से ज्यादा जरूरी है, अपने हितों की बलि चढ़ाकर उन पर कायम रहना। गाँधी विरोधी, इसलिए कि किसी को आधा-अधूरा जानकर विरोध का आधार तय करना सरासर अपराध है। उपन्यास के अंत में चाहे आप हरिलाल के पक्ष में खड़े हों या चाहे बापू के। एक बार आपकी अंतरात्मा निष्पक्ष विश्लेषण के लिए अवश्य बाध्य करती है।
हम जिनके लिए गाँधीजी या तो 'दो अक्टूबर' की छुट्टी है या खादी में 20 प्रतिशत की छूट है या फूहड़ 'एसएमएस' का विषय है या कोई कमजोर मुहावरा या सिर्फ 'फैशनेबल' एम.जी. रोड। भला कैसे जान सकेंगे कि तकिए की जगह लकड़ी के पटिए पर सोने वाला वह संत, आत्मशुद्धि के लिए बार-बार उपवास करने वाला वह शख्स कितना-कितना गहरा और सच्चा था।
गलती हमारी नहीं है बल्कि गलती उन लोगों की है, जिनके मुख से गाँधी-आदर्श हम तक पहुँचे। खुद उनकी कथनी और करनी में भेद था। पुस्तक के केंद्र में हरिलाल हैं, उनकी पीड़ा है, उनकी ही छटपटाहट है पर शब्दों की गुंथन इतनी प्रभावी है कि हम अनजाने ही बापू के प्रति भी करुण हो उठते हैं। इस सबके बीच 'बा' है जो पति और पुत्र के बीच जर्रा-जर्रा बिखरती हैं।
हरिलाल की मासूम पत्नी गुलाब है जो सीधे-सच्चे पति को बर्बाद होते देखती ही रह जाती है और एक दिन खत्म हो जाती है। हरिलाल यह सोचकर बर्बाद होता रहा कि बापू को हरा रहा है और खुद हार जाता है लड़ते-लड़ते। जब भी कोई छोटा काम करना चाहा उसने तो वह 'बड़ा' था और बड़े काम के लिए उसकी शिक्षा 'छोटी' थी, बस इसी विडंबना ने जीवनभर उसे असफलताएँ और विषाद की गठरी 'उपहार' में दी। इतिहास और इतिहास के सत्य को उद्घाटित करता एक अत्यंत पठनीय उपन्यास है 'उजाले की परछाई'।
पुस्तक : उजाले की परछाई लेखक : दिनकर जोशी गुजराती से अनुवाद : सूरजप्रकाश मूल्य : दो सौ पचास रुपए प्रकाशक : ज्ञानगंगा, 205-सी, चावड़ी बाजार, दिल्ली-110006
|