धारदार लेखनी और बेबाक टिप्पणियों के लिए पहचाने जाने वाले प्रभाष जोशी नहीं रहे। 1960 में उनकी कलम ने पत्रकारिता जीवन की जो शुरुआत इंदौर से की थी, वह कलम टूट गई। लेकिन, इन 49 सालों में उनकी कलम ने जो रचा वह पत्रकारिता की आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर बना रहेगा। इंदौर के रहने वाले प्रभाष जोशी ने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत 'नईदुनिया'से की थी। राहुल बारपुते के सान्निध्य में राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी उनके समकालीन थे।
1960 में उनके नईदुनिया से जुड़ने का प्रसंग विनोबा भावे के इंदौर आगमन से जुड़ता है। इस दौरान विनोबाजी इंदौर आए थे। उनका यहाँ करीब एक महीने रुकने का कार्यक्रम था। 'नईदुनिया'के संस्थापक बाबू लाभचंद छजलानी ने तय किया था कि जब तक विनोबाजी इंदौर में रहेंगे, तब तक उन पर चार पन्नों का एक परिशिष्ट नियमित अखबार के साथ निकाला जाएगा। यह विनोबाजी की दिनचर्या पर केंद्रित होगा। सवाल उठा कि इस परिशिष्ट की सामग्री कैसे तैयार होगी? क्योंकि, विनोबाजी पर नियमित रिपोर्टिंग वही कर सकता है जो उनकी विचारधारा में ढला हो और उन्हें समझता हो। तब प्रभाषजी इंदौर के नजदीक शिप्रा गाँव के एक स्कूल में पढ़ाते थे। लेकिन, लाभचंदजी के कहने पर वे विनोबाजी के साथ रहने और रिपोर्टिंग करने को तैयार हो गए।
ND
धोती-कुरता पहनने वाले प्रभाषजी सर्वोदयी विचारधारा के ही थे। नईदुनिया ने यह परिशिष्ट 39 दिन तक निकाला जो पाठकों को अखबार के साथ मुफ्त मिलता था। विनोबाजी तो अपनी यात्रा पूरी करके लौट गए, पर प्रभाषजी नईदुनिया में ही रह गए। वे 1966 तक नईदुनिया में रहे। 1965 में उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा भी की। पत्रकारिता की एक स्कॉलरशिप के तहत उन्हें वहाँ भेजा गया था।
1966 में नईदुनिया से निकलने के बाद वे भोपाल से निकलने वाले अखबार 'मध्यदेश'से जुड़े। करीब 1970-72 में वे दिल्ली चले गए और गाँधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़ गए। यहीं वे जयप्रकाश नारायण के संपर्क में आए और उनके जरिए उनकी निकटता इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका से बढ़ी। 1974 में वे पूरी तरह इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ गए और फिर जीवन पर्यंत उनके होकर रहे। इस दौरान इंडियन एक्सप्रेस के विभिन्न संस्करणों के संपादक रहे और 1983 में उन्हें इंडियन एक्सप्रेस के हिन्दी दैनिक 'जनसत्ता' के संपादक का दायित्व सौंपा गया। जिसने हिन्दी पत्रकारिता को भाषा और तेवर की एक नई दिशा दी। 1995 में इस दैनिक के संपादक पद से रिटायर्ड होने के बावजूद वे एक दशक से ज्यादा समय तक बतौर संपादकीय सलाहकार इस पत्र से जुड़े रहे।
प्रभाषजी को अपने खांटी देसीपन के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने महानगरीय पत्रकारिता के अँगरेजियत भरे माहौल में मालवी के कई ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जिसने मालवा की इस बोली को एक नई पहचान दी। उनका शब्द संसार बेहद विशाल था। लेकिन, उनकी वाक्य रचना छोटी होती थी। जिसमें मुहावरों और स्थानीय भाषा और बोली के शब्दों का भरपूर प्रयोग किया जाता था। प्रभाषजी ने सरोकारों के साथ ही शब्दों को भी आम जन की संवेदनाओं और सूचनाओं का संवाद बनाया। उन्होंने अखबार में उन शब्दों से परहेज किया जो आम बोलचाल में नहीं थे। उनका मानना था कि जो शब्द हम बोलचाल में नहीं लाते उन्हें अखबार के जरिए पाठकों पर नहीं थोपे जाना चाहिए।
जनसत्ता में हर रविवार को छपने वाला उनका कॉलम 'कागद कारे'पत्रकारिता और समकालीन प्रसंगों पर उनकी टिप्पणी का दस्तावेज माना जाता है। उनका यह कॉलम उनकी रचना संसार और शब्द संस्कार की अद्भुत मिसाल है। इस कॉलम के जरिए वे दैनंदिनी की घटनाओं को वर्णनात्मक रूप में प्रस्तुत करते थे। इस कॉलम में पत्रकारिता के अलावा कला, खेल, संस्कृति के साथ उनसे मिलने वाले लोगों का भी जिक्र आ जाता था। यहाँ तक कि उनके घरेलू माहौल के अलावा उनके पालतू कुत्ते की आदतों को भी उन्होंने अपने इस कॉलम में जगह दी थी।
सामाजिक सरोकारों और देसज संस्कारों के प्रति प्रभाषजी का समर्पण अतुलनीय है। सर्वोदय और गाँधीवाद उनकी विचारधारा में गहराई तक रचा बसा था। जयप्रकाश नारायण ने 1972 में जब मुंगावली की खुली जेल में माधोसिंह जैसे डाकुओं का आत्मसमर्पण कराया तब प्रभाषजी इस अभियान का एक हिस्सा थे। (नईदुनिया संदर्भ)