'शब्द शब्द है। उसे किसी की नफरत छू जाए तो वह एक गाली बन जाता है। वह आदि बिन्दु के कम्पन को छू ले तो कॉस्मिक ध्वनि बन जाता है और वह किसी की आत्मा को छू ले तो वेद की ऋचा बन जाता है, गीता का श्लोक बन जाता है, कुरान की आयत बन जाता है, गुरुग्रंथ साहब की वाणी बन जाता है...।
ठीक उसी तरह, जैसे पत्थर पत्थर है - गलत हाथों में आ जाए तो किसी का जख्म बन जाता है, किसी माइकल एंजेलो के हाथों में आ जाए तो हुनर का शाहकार बन जाता है, किसी का चिंतन छू ले तो वह शिलालेख बन जाता है। वह किसी गौतम का स्पर्श पा ले तो वज्रासन बन जाता है और किसी की आत्मा उसके कण-कण को सुन ले तो वह गारे-हिरा (हीरों की गुफा) बन जाता है।' - अमृता प्रीतम शब्दों की महत्ता असीम है। आज समूची दुनिया आत्मीयता युक्त दो मीठे बोल की मोहताज है।
ईंट-कांक्रीट के इस संसार में मीठे, अपनत्व भरे बोल का अस्तित्व वैसा ही है, जैसे चिलचिलाती तेज धूप में अमलतास खिल आया हो या जैसे कसमसाती तपिश में हरे-भरे घने वृक्ष का साया। बोल तो बोल हैं। अनुराग का अभिस्पर्श पाने पर वे शहद-से मीठे लगने लगते हैं और किसी की क्रोधाग्नि स्पर्श कर लें तो विषाक्त हो जाते हैं। अहंकार से आपूरित हृदय से निकले बोल पराए हो जाते हैं, चाहे अभिव्यक्त करने वाला कितना ही सगा कहलाता हो।
वहीं निर्दोष - निर्मल मन में निःसृत, सरल, सुखद बोलो से पराए भी अपनों की श्रेणी में आ जाते हैं। ये बोल ही तो हैं, जो एक झटके में रिश्तों के मजबूत धागों को खींचकर तोड़ डालते हैं और ये बोल ही हैं, जो मात्र परिचय को सुनहरी, रेशमी डोरी से बाँधकर प्रगाढ़ संबंधों में बदल देते हैं। इन्हीं बोलों की कृपा है कि नितांत अपरिचित यकायक बेहद अपना-सा लगने लगता है और रात-दिन निकटता का दंभ भरने वाला, वर्षों का गहरा परिचित इन्हीं बोलों से परायों की दूरस्थ पंक्ति में खड़ा हो जाता है। अजनबी को अपना और अपने को अजनबी बनाने में ये बोल बड़ी निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।
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