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Written By स्मृति आदित्य

खिले भाव सुमन

खिले भाव सुमन
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प्रकृति में निहित अपार सौंदर्य को अनेक साहित्यकारों, मानस-मर्मज्ञों एवं कवियों ने विविध रूपों में व्यक्त किया है। प्रकृति के कण-कण में जीवन है, जीवन देने की क्षमता है और जीवन-दर्शन भी है। प्रकृति में ही पोषित-पल्लवित हो रहे हम मानव इसे कितना सुन पाते हैं, समझ पाते हैं और महसूस कर पाते हैं ? इसका उत्तर नकारात्मक और सतही ही होगा। जबकि प्रकृति अपने विविध स्वरूपों के माध्यम से निरन्तर संचार करती है।

प्रकृति से जुड़ी कई छोटी-छोटी बातें, अनुभव और कहानियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें हम कभी तो आपस में बाँटना चाहते हैं और कभी लगता है किसी को बताएँ तो क्यों बताएँ ? कोई सुनेगा तो आखिर क्यों सुनेगा ? लेकिन मानव मन बहुत उतावला होता है, भोला और उत्साही होता है। दिन भर न जाने कितनी ही अर्थहीन बातें परस्पर बाँटता रहता है किन्तु वे सारी निरर्थक दिखाई देने वाली बातें अत्यन्त सार्थकता लिए होती हैं।

सार्थक इसलिए कि इनमें हँसी छुपी होती है, मुस्कान निहित रहती है और एक ऐसी किलकती-चहकती खुशी दबी होती है, जिसे अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों का अपार भंडार भी नन्हीं-सी गठरी के सदृश्य लगने लगता है। बस, अनुभूत किया जा सकता है। प्रकृति कभी-कभी अनजाने ही जीवन का मूलमंत्र सिखा जाती है। आवश्यकता होती है प्रकृति के इन अनमोल नजारों को समझने और महससूने के लिए संवेदनशील हृदय की !

एक दिन सावन की साँवली संध्या में मैं अपने आँगन में बैठी अपनी सफलता-असफलता का हिसाब लगा रही थी। बार-बार असफलता का पीड़ादायक प्रतिशत सफलता के अनुपात में अधिक आ रहा था। दिल डूबता जा रहा था, निराश और कुंठा का स्याह घेरा बढ़ता ही जा रहा था। मैं दुबकी-सहमी इस घेरे से बचने का असफल प्रयास करने लगी।

बहुत हाथ-पैर मारने के बाद भी हताशा के भँवर में फँसती चली जा रही थी। तभी नजदीक रखे गमले में खिले ताजातरीन सुकुमार गुलाब पर बस नजर भर पड़ी और यकायक जैसे विचारों की श्रृंखला परिवर्तित हो गई। चेहरे पर खिली एक सहज मुस्कान ने जिस भव्य आलोक को प्रसारित किया इसकी रोशनी ने कब और कैसे नैराश्यपूर्ण अँधेरे को दूर कर दिया, पता ही नहीं चला।

सावन का मौसम सचमुच सलोना होता है। एक सुबह और किसी वजह से मैं रूआँसी हो रही थी व हताशा से हारी हुई अम्बर को ताक रही थी तभी सावन की रिमझिम बरसती सलोनी बूँद ने चेहरे पर गिरकर मुझे मुस्काने के लिए बाध्य कर दिया, इस बूँद ने जो पुलक मेरे अंतर में अंकुरित की, उसे शब्द देने के लिए संभवतः मैं सदैव असमर्थ रहूँगी। कितनी सार्थक थी प्रकृति प्रदत्त बारिश की वह पहली बूँद जिसने चेहरे पर गिरते ही न सिर्फ मुझे पुलकित और गदगद् कर दिया अपितु मैं भूल गई उस अवसाद को, उस पीड़ा को, जो कुछ देर पूर्व मुझे हैरान-परेशान कर रही थी।

प्रकृति कितना कुछ देती है हमें ! भोजन, वस्त्र और आवास ही नहीं बल्कि अनुभूतियों का सुकोमल संचार भी। प्रकृति की यह पावन अनुकंपा हम पर न होती तो आज प्रकृति पर रचित साहित्य का अपार सुसमृद्ध भंडार हमें उपलब्ध न होता। न जाने कितने संवेदनशील कवियों के गहरे हृदय को इस प्रकृति ने स्पंदित किया है और इनकी धड़कनों को लहलहाती अनुभूतियों द्वारा संचारित किया।

प्रकृति द्वारा प्रसारित खुशियों को अंगुलियों पर गिनाया जाना दुष्कर है। कभी मुट्ठी भर खनकती बयार ने हृदय में पायलों को रूनझुना दिया तो कभी चुटकी भर कुनकुनी घूप ने उष्म मानवीय अभिस्पर्श का अनुभव करा दिया। कभी बैखौफ-बेधड़क बरसते सावन ने हृदयांगन में स्नेहिल अनुभूतियों की थिरकनों को गुंजित कर दिया तो कभी रिमझिम गिरती मासूम फुहारों ने आत्मा के सप्त तारों को झनझना दिया।

कभी साँवले, स्लेटी बादलों ने आसमान की परतों से निकलकर धूप के कालीन की नुकीली छोरों को मोड़ दिया तो कभी नन्हीं-सी कली के चिटकने से अंतर्मन का सन्नाटा चिंहुक उठा। कभी गुड़हल के सूर्ख फूलों ने आँखों को चमक दी तो कभी नाजुक, नर्म हरी दूब ने आत्मा को ठंडक दी। कभी किसी छुटकी-सी चिरैया की चहचहाहट से कानों में सुमधुर घंटियाँ ध्वनित हो उठी तो कभी मेहँदी की शीतल मीठी खुशबू ने सपनों का सुहाना संसार रच दिया।

प्रकृति में न सिर्फ ममत्व है अपितु स्नेह, उत्साह, उदारता और आकर्षण भी सन्निहित है। प्रकृति की ये अगणित सौगातें, खुशियों और चरम आनंद के साथ-साथ कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने की शिक्षा भी देती है। आकाश के नीले आँगन में झिलमिल करते सितारें, लगता है अनुशासित रहकर बस अविचल अपना काम करते रहने की शिक्षा दे रहे हैं। भीगी चाँदनी में ओस की उस नन्हीं सी मधुरिम बूँद को देखा है, जिसे सिर्फ देखा जा सकता है, छुआ नहीं जा सकता ? आपको नहीं लगता जैसे प्रकृति इस दृश्य के माध्यम से हमसे मुखातिब है और कह रही है कि कुँवारी कन्या ऐसी ही होती है जिसे बस सम्मान और स्नेह से देखा जाना चाहिए ?

चमकते चाँद को ही लें, उसके हर रूप का विशिष्ट महत्व है। दूज का चाँद, चौदहवीं का चाँद, शरद-पूर्णिमा का चन्द्रमा चतुर्थी का चन्द्र और ईद का चाँद ! हर चन्द्रमा की अपनी एक अलग मोहक, मधुर कहानी है। चन्द्रमा शिक्षा देता है इनके माध्यम से, प्रतीक्षा करते हुए धीरज और आस्था को बनाए रखने की। चतुर्थी की तिथि को ही चन्द्र देरी क्यों करता है ? ईद का चाँद ही हमारे सब्र का इम्तहान क्यों लेता है ? वास्तव में चन्द्रमा के इंतजार में अनूठी मिठास छुपी है। जब भूख से व्याकुल, चतुर्थी के चाँद की प्रतीक्षा होती है तब कितनी आकुलता और बेसब्री होती है कदमों में ! कैसे-कैसे विचार आते हैं !

इतनी इमारतें खड़ी हो गई हैं आजू-बाजू . . . . कैसे दिखेगा अगर उदय हो भी गया। फिर लगता है लो बादलों को भी अभी ही आना था। शायद पेड़ के पीछे हो न . . . . न इस तरफ उजाला है . . . .। चारों तरफ गर्दन घुमाने के साथ-साथ दीपक, जल, दूध, फूल, कुंकुं, अबीर, प्रसाद सब थाल में सजते जाते हैं तभी आगे वाली इमारत पर दीप जल उठता है और व्यग्रता चरम सीमा पर पहुँच जाती है, कितनी बार कहा है, एक मंजिल और उठा लो। ऐसे समय में ही तो परेशानी होती है।

तभी बादलों का रूपहली चमकीली किनारों से सजा पर्दा आहिस्ता से हटाते हुए सौम्य सुरीला, चमकता चाँद इस उतावलेपन पर मुस्करा ही उठता है। बस, अब जो किलकती, चिहुँकती बच्चों जैसी भोली पुलक हृदय में स्फुरित होती है, उसे किन शब्दों में, कैसे अभिव्यक्त किया जाए ? भावातिरेक में कुछ भी तो समझ में नहीं आता कि इस चाँद का क्या किया जाए जो इतनी आकुल प्रतीक्षा के उपरान्त मिला है ?
कभी फूल, कभी अर्ध्य, कभी कुंकुं और कभी दूध चढ़ाते हुए कहाँ ध्यान रहता है वह मंत्रा जो चन्द्रमा के समक्ष बोलना था, वह मनोकामना जो दिनभर से सँजोकर रखी थी, वह विधि-विधान जो पुस्तक में पढ़ा था।

कुछ भी तो ध्यान नहीं रहता है बस, खो जाते हैं चाँद की चमकती दुनिया में और फिर जैसे ही उस चमकीली रूपहली दुनिया से निकलकर यथार्थ की छत पर ध्यान जाता है तुरन्त याद आता है - वह मंत्र, वह मनोकामना, वह पूजन विधि, किन्तु तब तक चन्द्रमा अपने चमकते हाथों से बादलों की गुदगुदी रजाई में किसी शैतान बच्चे की भाँति मुँह ढँक लेता है और एक हल्का-सा असंतोष छा जाता है पर यह संतोष बहुत बड़ा होता कि चाँद देख लिया और इस बड़े संतोष को अपार हर्ष के साथ महसूसते हुए सारे असंतोष भुला दिए जाते हैं।

कई और व्रत इसी तरह से प्रकृति से जोड़े और बाँधे रखते हैं। पौष माह में रविवार के उपवास किए जाते हैं। इस मौसम में, (विशेषकर रविवार को) सूर्य देवता बहुत सताते हैं। बादलों की मखमली रजाई में घण्टों छुपे रहते हैं। सब जानते हैं कि वे सो नहीं रहे, बस नींद की खुमारी में हैं, लेकिन एक झलक दिखाने में इतने नखरे करते हैं कि टकटकी लगाए आसमान निहारते रहो, पर नजर नहीं आते।

बेसब्र होकर जैसे ही घर के अंदर जाने को उद्यत होते हैं वे तुरन्त ही सुनहरी किनारियों से सजी बादलों की मोटी रजाई हटाकर किसी गोरे-गोरे, नटखट, आलसी और गुदगुदे बच्चे की तरह उठ बैठते हैं और खिलखिलाने लगते हैं। यूँ तो इन व्रतों का अपना अनुष्ठानिक महत्व है किन्तु ये मानव मन को भावनात्मक रूप से कितना अलौकिक अनुभव कराते हैं और प्रकृति से कितनी प्रगाढ़ और मीठी प्रीति उत्पन्न करते हैं, इसका अनुमान लगाना सहज संभव नहीं है।

कितने अनमोल और महत्वपूर्ण हो जाते हैं इन व्रतों के दौरान सूर्य-चन्द्रमा। दर्शन से पूर्व कैसे-कैसे विचार आलोड़ित होने लगते हैं लेकिन दर्शन होते ही सब कुछ शांत, स्निग्ध और सौम्य-सा लगने लगता है। कितनी विलक्षण और अगाध खुशी मिलती है, चलो व्रत सार्थक हुआ। जो लोग नियमित रूप से सूर्य देवता को अर्ध्य देते हैं उन्होंने इस असीम हर्षानुभूति को स्वयं महसूस किया होगा।

बरखा के घनघोर बादलों के बीच, जबकि सूर्यदेवता के आगमन का कहीं कोई संकेत नहीं दिखाई देता है, जैसे ही अर्ध्य देना आरंभ किया और आसमान पर दृष्टि डाली वैसे ही प्राची से गोल-गोल घूमते हुए ताजातरीन सूरज देव अपनी झलक मात्रा दिखा देते है। सूर्यदेव की उपस्थिति के कहीं कोई आसार नहीं है पर अंतरतम्‌ से जल चढ़ाते हुए मन में एक ही अभिलाषा छलछलाती है।

बस दिख भर जाए और जब सूर्यदेव दिख जाते हैं तो अनंत खुशी से हृदय थिरक उठता है। जैसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो गई हों। सम्पूर्णता के बोध से रोम-रोम में स्फूर्ति आ जाती है। यह एक उपलब्धि, हजारों सांसारिक, भौतिक उपलब्धियों से कहीं बढ़कर होती है।

भारत जैसे पारम्परिक देश में प्रकृति-प्रधान पर्वों, व्रतों और उत्सवों की कमी नहीं है। एक और व्रत है जिसे कोकिला व्रत कहा जाता है। कोयल की आवाज सुने बगैर कुछ ग्रहण नहीं कर सकते। गर्मियों के मौसम में तो अमराई पर झूलती, चिहुँकती, कुहूकती कोयल को आसानी से देखा या सुना जा सकता है। ग्रीष्म की तो पहचान ही कोकिला से होती है। किन्तु यह व्रत तब होता है जब चहुँओर सावन के सुखद बरखा कणों का बरसना आरंभ हो जाता है।

इस मौसम में कोयल भी करीब-करीब लापता हो जाती है किन्तु इस व्रत की महानता और कोयल की उदारता की ऐसे विषम मौसम में भी वह कहीं दूर से कुहुक ही देती है और सचमुच मोहक मधुर कंठी कोयल तब और अधिक मीठी लगने लगती है। व्रत करने वालों को अपनी समूची श्रवणेन्द्रियाँ आसपास के परिवेश पर लगाकर सचेत रहने की जरूरत होती है, वरना कोकिला की सुरीली तान से वंचित रह जाना पड़ सकता है। कितने मीठे, सजीले, सुवासित और सुरीले भाव प्रकृति के आँचल में दमक रहे हैं जो क्षण-प्रतिक्षण हमें उत्साह, खुशियाँ, अनुभूतियाँ, सीख और अनुशासन देने के लिए लालायित और तत्पर हैं।

प्रकृति में जहाँ उदित होते सूर्य में उमंग है, वहीं उदय होते चन्द्रमा में विनम्रता और शीतलता है। कोपल अंकुरण में बच्चों-सी मासूमियत है और उसके स्फुरण में जीवन दर्शन है। नीड़ों में लौटते सांध्य पाखियों में आशियाने का महत्व है तो टिमटिमाते सितारों में कुटुम्ब और समाज सम्मिलन का संदेश है। पवित्रा नदियों के कलकल ध्वनित प्रवाह से निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है तो किसी आकर्षक फूल से सदैव मुस्कराते रहने की शिक्षा मिलती है।

यदि प्रकृति के प्रति स्नेह-निर्झरण अनवरत होता रहे तो निश्चय की एक दिन चन्द्रमा की पतली रूपहली गोटे-सी लकीर किसी की मुस्कान लगने लगेगी, उदित होते रक्तिम सूर्य की नारंगी किरणें आँखों में चमकने लगेंगी या फिर सितारों की धूसर रोशनी से आपूरित नीला अंबर, लहराते मेहँदियाँ वालों और इन पर सजे फूलों सा लगने लगेगा। बस एक बार प्रकृति में निमग्न होना है फिर तो आने वाला हर प्रभात सरस होगा और रातें रसमय। प्रकृति के आत्मीय रिश्ते ने ही कवि गुलजार से ये त्रिवेणियाँ लिखवा डालीं।

* उठ के जाते हुए पंछी ने
बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही
वो शाख फिजाँ में
अलबिदा कहने को, या पास बुलाने के लिए

* रात के पेड़ पे कल ही देखा था
चाँद, बस पक के गिरने वाला था
सूरज आया था, जरा उसकी तलाशी लेना/

* माँ ने इक चाँद सी दुल्हन की दुआएँ दी थीं,
आज की रात जो फुटपाथ से देखा मैंने/
रात भर रोटी नजर आया है वो/ चाँद मुझे' ।
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स्मृति आदित्य