हफ्ते में एक बार पिताजी की आज्ञा है। हमारी शर्त यही है, रात को आकर कहानियाँ सुनानी होगी। खाने-पीने के बाद चाँदनी रात के जादुई माहौल में हम सब लोग चारपाइयों और मूढ़ों पर बैठ जाते हैं और बेले-मेहँदी की गंध से वातावरण महकता रहता है।
उधर अँधेरे में बरामदे की सीढ़ियों पर बाई (माँ) बैठती है। बहुत विस्तार, ब्यौरे और पूरी नाटकीयता से कहानी सुनाता है भिक्खी। बैताल-पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी स्रोत है। शाम को अखबार आता है, शायद 'हिन्दुस्तान टाइम्स।'
कस्बे के दो-चार लोग, अगर संबंध अच्छे हुए तो थानेदार, कम्पाउंडर सब लालटेन के आसपास जमा होकर उसे षड्यंत्रकारियों की तरह पढ़ते हैं, बहस करते हैं। लड़ाई शुरू हो गई है।
गाँधी और कांग्रेस का जोर है। अँगरेजों की हार से खुशी होती है। दिन में अस्पताल के समय के अलावा पिताजी मेरे पास अक्सर ही आराम से मुढे पर बैठकर अलिफ-लैला, दास्तान अमीर हम्जा की कहानियाँ पढ़कर सुनाते हैं और जहाँ छोड़ जाते हैं, वहाँ मेरी जान अटकी रहती है।
मैं खुद सारे दिन इन्हीं किताबों को पढ़ता हूँ...और धीरे-धीरे हिन्दी-उर्दू के घटना प्रधान, जासूसी-तिलस्मी उपन्यासों पर आ जाता हूँ। छोटा भाई सत्येन्द्र अब आगरे में पढ़ने लगा है। जब वह आता है तो पतंग, माँझा, चाबीवाले खिलौनों को साथ लाता है, सेक्स्टन-ब्लैक और राबर्ट-ब्लैक के उपन्यास या दरोगा-दफ्तर सीरिज और 'प्रभात किरण' की दो आना सीरिज की उपन्यास माला की पुस्तकें भी ले आता है।
साप्ताहिक 'देशदूत' में गोपाल राम गहमरी का 'झंडा डाकू' इतनाक में दिया जाता है कि हर समय जान वहीं उलझी रहती है। कहानियाँ,अपने रोमांचक अनुभव सुनाता केशो महाराज भी है। मगर भिक्खी के कहानियाँ सुनाने का मजा ही दूसरा है-एकदम तस्वीर खड़ी कर देता है, स्थिर नहीं, चलती-फिरती तस्वीरें...
कड़वी-मीठी दवाओं, इंजेक्शनों और पट्टी बदलने के बीच यों बँधे-बँधे लेटे रहने से मेरी कल्पना बहुत तेज हो गई है और उसमें समिधा देती है ये पढ़ी-सुनी हुई कहानियाँ। मैं सारे दिन सपने देखता हूँ, उड़ता हूँ और समझने की कोशिश करता हूँ कि सोते समय राजा का हाथ रानी के गले या छाती पर ऐसे किस तरह और क्यों पड़ गया कि उनका नौलखा हार बिखर गया? उपन्यासों में जो बार-बार प्यार और मुहब्बत की बातें आती हैं, उनका क्या मतलब है?
या मरजीना ने घड़ों में जब गर्म तेल डाला तो वह तख्ते से चिपका कैसे, कितने दिनों में किनारे आया होगा? पीर-तस्मा पा को कंधे पर चढ़ाते ही उसने कैसे चमगादड़ की तरह सिन्दबाद की गर्दन अपनी टाँगों में भींच ली? क्या संटियाँ मार-मारकर चौबीसों घंटे उसे हाँकता ही रहता था, 'चल, इधर चल, उधर दौड़, खबरदार जो रुका तो।' क्या टाँगों में गर्दन फँसाए ही सोता था? पहाड़ों से आती हुई वह आवाज कैसी थी जिसे सुनकर हातिम बेसाख्ता उधर दौड़ पड़ा?
सचमुच तब मुझे कतई अहसास नहीं था कि अपने भीतर के पहाड़ों से आती किसी आवाज को मैं भी तो ठीक उसी तरह सुनने लगा हूँ। सिर्फ इतना पता था कि मैं सारे दिन बैठकर कुछ न कुछ लिखने की कोशिश करता रहता हूँ।
आसपास के लोगों पर कविताएँ लिखकर मैं तिलस्मी उपन्यास लिखने में जुट जाता हूँ 'देवगिरि'। तय है कि चंद्रकांता-सन्तति से बड़ा होगा, ज्यादा जटिल होगा। रहस्य-रोमांच, देशभक्ति, क्रांतिकारिता और एडवेंचरिज्म सभी कुछ होगा उसमें। बाई जो बंदी-जीवन, सावरकर, आजाद-भगतसिंह या 'चाँद' के फाँसी अंक की कहानियाँ सुनाया करती थी, वे ही नसों में सनसनाती रहती। काश, मैं भी किसी ऐसे क्रांतिकारी को देखूँ, मिलूँ। बम बनाने की कोशिश सिर्फ गंधक, शोरा और पिसा कोयला मिलाकर पटाखे बनाने तक रह जाती है।
मेरी दुनिया आधी कल्पना की बनी है, आधी-वास्तविक। जिंदगी में जितना भी एक्शन नहीं है, लिखने में उतना ही बढ़-चढ़कर आता है; दौड़ लगाते घोड़े, दसियों लोगों को मार गिराने वाले नायक, गोलियों को झूठलाते और किलों की ऊँची-ऊँची दीवारों को इच्छानुसार फलाँगते रूप बदलते अय्यार...आज लगता है कि इन रचनाओं के बहाने मैं देश-काल दोनों को फलाँग जाना चाहता था।
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