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वसंत का प्रेम गीत
आनंद ऋतु वसंत ने दी कोमल दस्तक
- स्मृति जोश
ND
'इंद्रधनुषों से घिरी हुई हूँ मैं जब से तुमने मुझे
नाम से पुकारा है,
जब से तुम्हारे हाथों को छुआ मैं वसंत हुई
फिर पतंगों सा उड़ा मन
देखकर तुमको।'
-अज्ञा

'वसंते सानंदे कुसुमित लताभिः परिवृते
स्फुरन्नानापद्मे सरसि कलहंसानि सुभगे
सखीभिः खेलन्ती मलयपवनान्दोलितजले
स्मरेधस्त्वां तस्य ज्वर जनित पीड़ा पसरति'

हे देवी, वसंत में खिली लताओं से मंडित, नाना कमलों से, हंसों की मंडली से अलंकृत मलय पवन से आंदोलित सरोवर में सखियों के मध्य क्रीड़ा करती हुई तुम्हारा ध्यान करने से ज्वरजनित पीड़ा दूर होती है। -आनंद लहरी

वसंत- इस एक सुकुमार शब्द के साथ ही ध्वनित होता है स्वर्णिम पीत आभा लिए जगमगाता उपवन, माँ सरस्वती के आह्वान का अवसर और आम्र मंजरियों की नशीली रतिगंध का मौसम। ऋतुओं का यशस्वी राजा वसंत मानव-मन पर बड़ी कोमल दस्तक देता है। मन की बगिया में केसर, कदंब और कचनार सज उठते हैं, बाहर पलाश, सरसों और अमलतास झूमने लगते हैं।

पछुआ के सर-सर स्पर्श से, खेतों में खर-खर उड़ते दानों और भूसे के स्वर से सहज ही वसंत मुस्कराने लगता है। एक महकता, मदमाता, मस्ती भरा मौसम वसंत कवियों की लेखनी में चपलता से आ बैठता है। यूँ तो हर मौसम एक कविता होता है। और वसंत प्रेम कविता।
  रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था, जिसके अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने आज्ञा जारी की कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया।      
'जब पलाश वन में दहके
कोमल शीतल अंगारे
निशा टाँकती, सेमल के
अंगों पर लाल सितारे

शाम सिन्दूरी याद दिलाती
शाकुन्तल-दुष्यंत की
मन के द्वारे पर हौले से
दस्तक हुई वसंत की।
-भगवत दुब
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