इतवार 11 नवंबर 2007 को मौ. अ. कलाम आज़ाद का 119वाँ यौम-पैदाइश था- इंदौर की मौ. अ. आज़ाद अकेडमी ने इस मौके पर एक सेमीनार का इनऐक़ाद इंदौर, प्रीमियर को-आपरेटिव बैंक के वसी और खूबसूरत हाल में किया। इस सेमीनार में मुल्क के मशहूर सहाफ़ी जनाब कुलदीप नय्यर के साथ, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डॉ. भागीरथ प्रसाद और उर्दू अकादमी म.प्र. भोपाल की सेक्रेटरी मोहतरमा नुसरत मेहदी ने भी हिस्सा लिया।
जनाब कुलदीप नय्यर ने मौलाना से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए कहा कि मौलाना एक सच्चे और अच्छे हिंदुस्तानी थे। हमेशा आगे की सोचते थे। मुल्क के मुस्तक़बिल पर हमेशा उनकी नज़र रही। वो नहीं चाहते थे के मुल्क दो हिस्सों में तकसीम हो। इस मद्दे को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और महात्मा गाँधी से उनकी कई बार बहस हुई। उन्होंने मुसलमानों को भी समझाने की कोशिश की।
उनकी ईमानदारी की मिसाल देते हुए उन्होंने कहा के उनकी मौत के बाद पता चला के उनके पास किसी तरह दौलत या प्रॉपर्टी नहीं है जबके वह कई साल तक मुल्क के महक्मा-ए-तालीम के अहम वज़ीर रहे। आज हम देखते हैं के एक मामूली नेता भी चंद सालों में लाखों-करोड़ों का मालिक बन बैठता है। मौजूदा दौर में मुसलमानों की हालत के बारे में अफ़सोस करते हुए जनाब नय्यर ने कहा के मौलाना ने इस खतरे से पहले आगाह कर दिया था।
आजादी की लड़ाई में दोनों ने (हिंदू-मुस्लिम ने) बड़ी कुरबानियाँ दी हैं। फिर एक को उसका हक क्यूँ नहीं मिल रहा है। आयोग बनते हैं, रिपोर्ट पेश की जाती है लेकिन क्या उस रिपोर्ट पर अमल होता है? इन हालात से डरने या घबराने की जरूरत नहीं। अब ये हालत जरूरत बदलेगी। जनाब नय्यर ने बहुत ही सरल तरीके से आसान हिंदुस्तानी जुबान का इस्तेमाल करते हुए अपनी तफ़रीर से अवाम का दिल जीत लिया। बीच-बीच में डॉ. इकबाल और फैज़ अहमद फैज़ के अशआर भी आपने सुनाए।
डॉ. भागीरथ प्रसाद ने कहा कि लिटरेसी प्रोग्राम की हम आज बात कर रहे हैं। दरअसल यह प्रोग्राम मौ. अ. आजाद ने अपने दौर में ही शुरू कर दिया था। मोडरन एजुकेशन की बात हम आज कर रहे हैं। इस तालीम को भी मौलाना के दौर में शुरू कर दिया गया था। मौलाना ने वज़ीर-ए-तालीम रहते हुए बड़े अहम कारनामे अंजाम दिए।
मुल्क में आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत को 150 साल हो चुके हैं। हम अहल-ए-वतन की कुरबानियों को याद कर रहे हैं। इस मौके पर मैं यह बताना चाहूँगा कि एक जुलाई 1857 को सआदत खाँ को रेसीडेंसी कोठी इंदौर के सामने 14 सालों की जद्दोजहद के बाद फाँसी दी गई। इसी तरह मुल्क के कोने-कोने में मुसलमानों ने जंग-ए-आजादी में हिस्सा लिया और बड़ी-बड़ी कुरबानियाँ दीं- मौलाना आजाद देश को एक रखना चाहते थे वह मुल्क की तक़सीम के सख़्त मुख़ालिफ थे।
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