इंदौर में गुजिशता हफ्ते यूनेस्को (शाख मुंबई) ने मौलाना आजाद एजुकेशन एवं टेक्नीकल सोसायटी इंदौर के तत्वधान से मौलाना रूम पर एक सेमिनार का इनए़क़ाद़ किया- शाम पाँच बजे से सात बजे तक मौलाना रूम की मसनवी पर अँग्रेजी में तहकीक करने वाले और यूनेस्को के नुमाइनदे जनाब डॉ. नेविट अरगिन की अँग्रेजी में तकरीर हुई- डॉ नेविट के पास बैठे फादर वर्गीज ने साथ ही साथ उसका तरजुमा हिंदुस्तानी जुबान में पेश किया।
डॉ. नेविट ने बताया कि आज अमेरिका और दुनिया के दीगर मुमालिक में मौलाना रूमी का कलाम सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है- क़ुरआन और बाइबल के बाद मौलाना रूमी के कलाम की लोग इज़्ज़त करते हैं और उसे पढ़ते हैं।
दुनिया के दीगर मुमालिक के शायर और अदीब भी मौलाना रूमी के कलाम से मुतास्सिर हैं- हिंदुस्तान में मीरा बाई, कबीर, इकबाल, माहिरूल कादरी, और नजरूल इसलाम भी मौलाना रूमी के कलाम और उनकी फिलोसाफी से मुतास्सिर नजर आते हैं।
डॉ. नेविट अरगिन की तकरीर के बाद सवाल ओ. जकाब का दौर शुरू हुआ। डॉ. नेविट ने अपने जबाव से सइमईन को मुतमइन करने की कोशिश की लेकिन लोग पूरी तरह से मुतमइन नजर नहीं आए। लोग मौलाना रूमी का फारसी कलाम सुनना चाहते थे मगर डॉ. नेविट से फारसी में कलाम न सुनकर मायूस हुए। लोगों की इस मायूसी और नाउम्मीदी को मुफ्ती-ए-मालवा जनाब हबीब यार खान और उनके साथियों ने किसी हद दूर किया- तक़रीर और गुफ़्तगू से यही बात सामने आई के अल्लाह-ईश्वर एक ही है। हमें उसी को याद करना चाहिए और उसकी याद में अपने आपको भुला देना चाहिए। 'समाँ' की कैफ़यत इसी हकीकत को जाहिर करती है। ईश्वर की बातें और तारीफ सुनकर लोग अपने आप को भूल जाते हैं और झूमने और मस्त होकर नाचने लगते हैं।
हमारे देश के संत आसाराम बापू भी मौलाना के चाहने वालों में से एक हैं। अपने प्रोग्रामों में खुलकर मौलाना रूमी की फिलोसाफी का, तौहीद, एकता और भाईचारे का जिक्र करते हैं।
यूनेस्को ने तुर्की की सिफारिश पर मौलाना रूमी की 800वीं सालगिरह के मौके 2007 को रूमी इंटरनेशनल साल का ऐलान किया है- यूनेस्को मुखतलिफ मुमालिक में मौलाना रूमी पर अलग-अलग तरह के प्रोग्रामों का इनए़काद कर रहा है- मौलाना जलालउद्दीन रूमी 30 सितंबर 1207 को बल्ख, अफगानिस्तान में पैदा हुए। 1273 में कोनिया (तुर्की) में) आपने रेहलत फ़रमाई। फारसी और अरबी में आपको ज़बरदस्त महारत हासिल थी। सूफी संत शम्स तबरेज की सोहबत से आपको रूहानी फैज हासिल हुआ।
रात 8 बजे से क़व्वाली का दौर शुरू हुआ। हिंदुस्तान के मशहूर कव्वाल जनाब मुनव्वर मासूम और उनके हमनवाओं ने सूफि़याना कलाम पेश किया-अमीर खुसरो के कलाम पर कुछ लोगों पर वज्द की कैफयत तारी हो गई और खड़े होकर कव्वाल के सामने जाकर, झूमने लगे- क़व्वाली के ऐसे माहौल को ही 'समाँ' कहते हैं। इंदौर के इस प्रोग्राम में मौजूद काफी लोगों ने पहली बार 'समाँ' का माहौल देखा।
इस प्रोग्राम को कामयाब बनाने में मौलाना आज़ाद एजुकेशन और टेक्नीकल सोसायटी के सद्र जनाब हलीम खान बेइन्तेहा महनत की। उर्दू-हिन्दी के कलमकारों ने बड़ी तादाद में शिरकत की- मोहतरमा तसनीम (मुंबई) शहर काजी जनाब इशरत अली, मुफ्ती-ए-मालवा जनाब वहीद यार खान, डॉ. नरेंद्र वीरमानी, प्रो. ए.ए. अब्बासी, डॉ. एन.सी. नाहर, फादर वर्गीस, सिस्टर अंजली जॉन, अजीज अंसारी, डॉ. निजामुद्दीन अजीज इरफान, वहीद साहब, प्रोफेसर हीदस अंसारी, सदा शिव कौतुक, विश्वनाथ कदम, अनवर खान, वगैरा-वगैरा के नाम क़ाबिल-ए-जिक्र हैं।
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