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बचपन की यादों में उड़ते रूई के फाहे
जीवन के रंगमंच से...
माँ
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तेज बारिश में हम भाई-बहनों की नींद खुल जाती और हमें माँ-पिताजी के प्रार्थना के शब्द सुनाई पड़ते। माँ-पिताजी अगली बार छत पर नए कवेलू लगवाने की बात करते। तेज बारिश में उनकी बातों से अजीब वातावरण बन जाता। बाहर पानी की बूँदें टपकती और घर में माँ-पिताजी का दुःख।

इसी के साथ हम भाई -बहन घर की दीवारों के पोपड़े गिरते सुनते। दीवार में जहाँ-जहाँ से पोपड़े गिरते, सुबह उनमें माँ और पिताजी का दुःख काला-भूरा दिखाई देता। माँ गोबर और पीली मिट्टी से उन्हें भर देती। घर की दीवार पर ऐसा जगह-जगह था। ज्यादा बारिश होने से घर की दीवारों में सीलन आ जाती।

छत चूने(टपकने) से पटली पर रखी हमारी कॉपी-किताबें गीली होने लगतीं। फिर हमारे कपड़े गीले होते और फिर हमारे बिस्तर। घर कितना गीला हो गया है, ह देखने के लिए जब हम लाइट चालू करने उठते तो हमारे पैर किसी के हाथ, पैर या मुँह पर पड़ते।

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लाइट जलाने के बाद माँ बिस्तर ओटकर हमें सुलाती। सुबह हम भाई -बहन रात वाली बात याद कर खूब हँसते। हम रूई के फाहे उड़ते हुए देखते। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता कि माँ और पिताजी हँस नहीं रो रहे हैं, हालाँकि वे हमें हँसते हुए ही दिखते।

ठंड के दिनों में खूब मजा आता! हम भाई-बहन बीच में सोने के लिए झगड़ते। एक ही रजाई में हम सब सोते। बीच में सोने का फायदा था। रजाई छोटी थी इसलिए जो अगल-बगल में सोते वे रजाई की खींचातानी करते। बीच वाला मजे में रहता। इस तरह हम ठंड से लड़ते।

मुझे सपने नहीं आते। लेकिन एक दिन मुझे सपना आया। मैंने देखा कि पिताजी बर्फ के पहाड़ पर धीरे-धीरे चढ़ रहे हैं। पहले तो मैं उन्हें पहचाना ही नहीं। उनका बदन रूई के फाहों से ढँका हुआ था। ये वही रूई के फाहे थे जो हमारे घर पर छा जाते थे। ये ही दुःख माँ-पिताजी के हँसने पर रूई के फाहों में बदल जाते थे।

तो मैंने देखा कि पिताजी धीरे-धीरे पहाड़ पर चढ़ रहे थे। उनका बदन रुई के फाहों से ढँका है। मैंने उनकी आँखों से पहचाना कि ये तो पिताजी हैं। धीरे-धीरे वे चढ़ रहे थे। उन्हें बहुत ऊँचाई पर जाना था। बिलकुल शिखर पर, जहाँ कोमल हरी पत्तियों का पेड़ था।

बहुत घना और खूबसूरत पेड़ था वह, जिस पर हमारे तमाम सुख लाल सुर्ख सेबों की तरह उगे हुए थे। वे ही सेब पिता को तोड़कर लाने थे। -हमारे लिए, हमारे घर के लिए...और वे चढ़ रहे थे!

लेकिन मैंने देखा कि वे जितना ऊपर चढ़ने की कोशिश करते, उनके पैर उतने ही धँसते चले जाते। लेकिन पिताजी अपनी पूरी ऊर्जा, पूरी ताकत से धँसते पैरों को निकालकर चढ़ने की कोशिश करते। अचानक मैंने देखा कि बर्फ का पहाड़ धीरे-धीरे रूई के फाहों के पहाड़ में बदल रहा है।

और पिताजी धीरे-धीरे उसमें धँसते चले जा रहे हैं। मैंने देखा पिताजी कमर तक धँस गए हैं फिर गले तक! मैंने उनकी आँखों में चमक कम होती देखी, फिर वह चमक धीरे-धीरे बुझ गई। फिर आखिर में मैंने उनके हिलते और काँपते हुए हाथ देखे....

उसके बाद...उसके बाद घबराहट में मेरी नींद टूट गई। आँखें खोलने पर मैंने देखा कोई बाबाजी मेरे पास बैठे हैं। मैं चौंका। वे तो पिताजी थे और रजाई लपटे बैठे हुए थे। वे बुदबुदा रहे थे। रात के अंधेरे में मेरा ध्यान इस कदर पिताजी की तरफ था कि उनकी प्रार्थना के शब्द मुझे सुनाई नहीं दिए।

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सुबह जब हम भाई-बहन उठे, तो मैंने उन्हें अपना सपना सुनाया। माँ और पिताजी को बुलाकर भी सुनाया। और वह बात भी बताई कि पिताजी रात में रजाई लपटे कैसे बुदबुदा रहे थे। हम सब खूब हँसे। हमें हँसता देख माँ और पिताजी भी खूब हँ से। खूब हँसे। हमने देखा रुई के फाहे घर में उड़ रहे हैं! आँगन में उड़ रहे रूई के फाहे भी हमने देखे! छतों और दीवारों पर भी रूई के फाहे चिपकते हमने देखे!

खूब! खूब! खूब रूई के फाहे हमने उड़ते हुए देखे! बहुत बाद में जब हम भाई-बहन बड़े और समझदार हुए, हमें पता लगा कि वे रूई के फाहे नहीं, हमारे घर पर अक्सर छा जाने वाले दुःख थे!
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