| | यादों में महकती फलों की सुगंध | | | भूल गए हम अमरूद की गंध और खिरनी का स्वाद? | | | | | | | | |
|  | | रवींद्र व्यास |
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| पहले हमारे आँगन में एक मोगरे की कली खिलती थी तो पूरा आँगन खुशबू से महकने लगता था। हम उसकी मीठी और भीनी खुशबू से बावले हो जाते थे। चिल्लाते थे कि मोगरे की कली खिली है। क्या जमाना था जब मोगरे का खिलना एक खबर होती थी। एक घटना बनती थी। ठीक इसी तरह से एक अमरूद का पेड़ था। हम अमरूद के के आने का इंतजार करते थे। वे आते तो उनकी छोटी छोटी सी गोल हरी चकम हमें लुभाती थी। हम कहते थे कितने सारे अमरूद आए हैं। हम पकने का इंतजार करते थे। उन्हें धीरे धीरे बढ़ता हुआ देखते थे। कोई अमरूद थोड़ा भी बड़ा दिख जाता हम चिल्ला उठते थे। कई बार हम अमरूद के पेड़ को ध्यान से देखते। अक्सर अमरूद इन हरी पत्तियों के पीछे होते। हमें दिखाई नहीं देते। हम पेड़ के नीचे घूम घूम कर देखते। दिख जाता तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता था। वह महक और स्वाद से भरी एक अनोखी दुनिया थी। यह इतनी अनोखी दुनिया है कि हमारे समय के एक महान लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्केज तो एक कहानी लिखना बीच में ही छोड़कर रूक गए क्योंकि वे अमरूद की सुगंध कैसी होती है यह भूल चुके थे। यह कितनी मार्मिक और अनूठी बात है कि कोई है जो अमरूद की सुगंध को याद करने की कोशिश कर रहा है। वह कहानी में इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रहा है कि उसे याद ही नहीं आ रहा कि अमरूद की सुगंध कैसी होती है। यह भूलने के विरूद्ध के एक सबसे खूबसूरत कार्रवाई है। क्या हम भी चीजों का स्वाद और उनकी महक को नहीं भूलते जा रहे हैं। हम कई चीजों को सूँघते हैं लेकिन किसी चीज की गंध हमें याद नहीं रहती । हम कई चीजों और फलों को खाते हैं लेकिन किसी स्वाद याद नहीं रहता । अक्सर मैं एक पुल से गुजरता हूँ। रीगल सिनेमा से लगे इस पुल पर किनारे फुटपाथ पर टोपले लिए कुछ लोग बैठे होते हैं। उनके पास कभी जामुन होते तो कभी खजूर। कभी फालसे होते तो कभी खिरनियाँ और करौंदे। मैं रूककर कभी जामुन खरीदता हूँ कभी खिरनियाँ और कभी फालसे। घर जाकर उन्हें साफ पानी में धोता हूँ और बच्चों को कहता हूँ इनकी खुशबू लो। इन्हें चखो। बच्चे तो खिरनी औऱ फालसे जानते ही नहीं थे कि ये क्या होते हैं। मैंने कहा ये अनमोल फल हैं। इनका स्वाद अनूठा है। ये जुबान को ही नहीं आत्मा को भी तृप्त करते हैं। इन्हें चखो और धीरे धीरे इनका स्वाद लेते हुए खाओ। वे एक तो फल चखते हैं, और मुँह बिगाड़ते हैं। मैं जानता हूँ बच्चों का स्वाद बिगड़ गया है। अब वे पित्जा और बर्गर के आदी हो चुके हैं। वे क्या जानें जामुन, फालसे और खिरनियों का महकता स्वाद। हमारा जीवन भी बड़ा अजीब हो चला है। हम न तो चीजों को सही ढंग से सूँघ ही पा रहे हैं और न ही चख ही पा रहे हैं। क्या आप बताएँगे आपने आखिरी बार कब अमरूद या जामुन को फालसे या खिरनी को खाया था? उनका स्वाद कैसा था? क्या आप किसी फल की खुशबू को याद कर सकते हैं?बाजारों में इतनी तरह की खाने-पीने की चीजें हैं कि हम असल स्वाद भूल रहे हैं। अब तो 'क्या स्वाद है जिंदगी का' गाते हुए लोग चाकलेट बेचते हैं और खाते हैं। पर कोई नहीं कहता 'क्या स्वाद है अमरूद का'। क्या महक है मोगरे की। अब जब भी कहीं फूल खिले औऱ महक उड़े तो उसे गहरी साँस लेकर मन में बसा लीजिए। जब भी कहीं ठेले पर, फुटपाथ पर अमरूद, जामुन, फालसे या खिरनियाँ मिले उनका भरपूर स्वाद लें। इस तरह कि वह जुबान पर भी ठहरे और धीरे से उतरकर आत्मा को भी तृप्त कर जाए। यही जिंदगी की असली महक और असली स्वाद है। |
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