राहें, रास्ते, सड़क और मोड़। जीवन के रंगमंच से आपसे मुखातिब होते हुए मन एक भोले नन्हे बच्चे सा सहमा हुआ है। खुद पर विश्वास है, लेखनी पर भी विश्वास है बस इस मन पर विश्वास नहीं है। लेखनी को कब किस राह मोड़ दे, कह नहीं सकती।
जीवन की लंबी डगर पर कितने खूबसूरत पड़ाव आए। कभी चहक कर मन चिड़िया हो गया, कभी फुदककर गुलाबी खरगोश। कहीं राहों पर कँटीली झाड़ियाँ उलझी मिलीं, कहीं रेशमी नाजुक लताएँ। अभागा मन याद रखता है बस उलझनों को और उलझी हुई राहों को। बिसरा देता है वह अहम क्षण जब राहें सुलझने लगी थीं। सरल, स्पष्ट और सहज बन पड़ी थीं।
मानव मन बड़ा चंचल होता है। इसे राह-दर-राह साधे रखना पड़ता है। मुश्किल राहों पर तो यह जिद्दी बच्चे सा मचल उठता है। डपटने पर विद्रोही बन नजरें मिलाने की गुस्ताखी कर बैठता है। आप हैं कि सीधी राहों पर चलने के लिए प्रतिबद्ध, संकल्पों से लैस और वह (मन) है कि उन राहों पर जाने को बेताब, बेसब्र! जो हम जानते हैं अंधेरी हैं, कँटीली है, रेतीली और टेढ़ी-मेढ़ी हैं। मन की जिद- ' तो क्या हुआ चलकर तो देखूँ इस राह। चाहे मुश्किल भरी हो मगर बुला तो रही है।'
| | कैसे समझाएँ कि जो राह बुलाती है न, संदेह का कबूतर वहीं गूटरगूँ करता है। और जो राह बुलाती नहीं है जिस पर हमें चलना ही पड़ता है, वहाँ जीवन के खुले आकाश में तकलीफों के गिद्ध नहीं मंडराते। |
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कैसे समझाएँ कि जो राह बुलाती है न, संदेह का कबूतर वहीं गूटरगूँ करता है। और जो राह बुलाती नहीं है जिस पर हमें चलना ही पड़ता है, वहाँ जीवन के खुले आकाश में तकलीफों के गिद्ध नहीं मंडराते। हो सकता है जिस राह पर पर हम अभी चल रहे हैं, या कहें कि जिस पर हमें चलना पड़ रहा है, वो हमें अभी ना सुहाए, वहाँ इंद्रधनुष ना सजा हो, तितलियाँ अपने रंगों पर नहीं इतरा रही हों । लेकिन इन राहों पर सुकून की ठंडी मीठी बयार है, यहाँ वो जादूगरनी झाड़ियाँ नहीं हैं जो कोमल लता बनकर लुभाती हैं और फिर जकड़ लेती है अपने भयावह मोहपाश में।
क्यों हम न चाहते हुए भी कभी-कभी उन राहों पर चल पड़ते हैं जो हमारी नहीं होती है जो हमारे लिए नहीं बनी होती है। उफ, अब इतना तनाव लेने की क्या जरूरत है? जब चल ही दिए थे और समझ भी गए थे तो लौटना कोई मुश्किल तो नहीं? उस राह पर ईश्वर ने आपको इसलिए भेजा होगा कि कुछ 'सबक' के गहरे नीले फूल वहाँ से चुन सको। 'सीख' की जड़ी-बूटियाँ बटोर सको और 'समझ' की क्यारी में उन्हें रोप सको. .. जब लौटकर सही राह पर आओ। सुलझ गई ना समस्या?
राहें, सड़क, डगर, रास्ते खुद कहीं नहीं जाते, ना ही हमें कहीं ले जाते हैं। हम खुद उन पर चलते हैं, दुखी होते हैं और ना लौट पाने के अज्ञात डर से चलते ही रहते हैं। जबकि वापस लौटने की राह बड़ी सरल होती है क्योंकि वो देखी-परखी जो होती है। जीवन के किसी भी मोड़ पर जब चार राहें मिलें तो सोचना ठिठक कर, ठहर कर और हाँ मन का हाथ जरा कसकर थामे रखना। भटकेगा खुद और .... भुगतेंगे...(आप) ?
जीवन के कठिन मोड़ से कुछ सुस्त कदम रस्ते जाते हैं और कुछ तेज कदम राहें, गुलज़ार साहब के इस लोकप्रिय गीत को गुनगुनाते हुए, हमें बताएँ कि आपको एक लुभावनी और दूसरी सही राह एक साथ किसी मोड़ पर मिली तो आप कहाँ गए? उत्तर ईमानदारी से देंगे तो आगे राह आसान होगी।
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