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वो शख़्स साँसों में आ बसा है...  Search similar articles
- रोहित जैन
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वो शख़्स धीरे-धीरे साँसों में आ बसा है
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है

वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हँसे थे इत्तेफ़ाक़न
अब यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसा है

काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर
ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है

अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है
कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है

उम्मीद-ओ-हौंसला भी रिश्ता भी है ख़ला भी
वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है

कुछ रफ़्ता-रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता
वो शख़्स एकदम ही आहों में आ बसा है

उसकी पहुँच गज़ब है, वो देखो किस तरह से
दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है

क्या बोलता हूँ जाने, के पूछती है दुनिया
वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है।
और भी
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
तुम मेरे पास हो...
जब मौन पिघल जाता है......
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