- रोहित जैन वो शख़्स धीरे-धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है
वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हँसे थे इत्तेफ़ाक़न अब यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसा है
काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है
अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है
उम्मीद-ओ-हौंसला भी रिश्ता भी है ख़ला भी वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है
कुछ रफ़्ता-रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता वो शख़्स एकदम ही आहों में आ बसा है
उसकी पहुँच गज़ब है, वो देखो किस तरह से दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है
क्या बोलता हूँ जाने, के पूछती है दुनिया वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है।
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