मुख्य पृष्ठ > विविध > साहित्य > मंच अपना
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
राह-ए-मोहब्बत
गजल
रोहित जै
ड़ूबनेवाले को इक ही तिनके का सहारा काफ़ी है
समझदार को कहते हैं बस एक इशारा काफ़ी है

यूँ ही नहीं कहता हूँ मै के इश्क़ मोहब्बत धोखा है
राह-ए-मोहब्बत पर मैने भी वक़्त गुज़ारा काफ़ी है

क्या ग़म है जो मिला नहीं वो तुमने जिस को चाहा था
दरिया-ए-ज़िंदगी में तो बस यादों का किनारा काफ़ी है

सच ही है के कोई नहीं है साथ सदा देने वाला
हमने भी इक दौर था जब सब ही को पुकारा काफ़ी है

ऐ ख़ुदा तू नाज़ ना कर अपनी क़ायनात पे यूँ
सच्चाई दिखलाने को इक दर्द का मारा काफ़ी है

कब हमने मांगी थीं दुनिया की सारी खुशियां
तारीक रात में हम को तो बस एक सितारा काफ़ी है
सौजन्य से - रोहित
और भी
वॉलपेपर से जानिए व्यक्तित्व
हौसलों के पंख पर
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...
नाराजगी को संवाद दो
नगीना और अस्मिता
फासला...