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जीवन का रंग
जीवन के रंगमंच से...
शैफाली शर्मा
ND

मैं निकल रहा था जीवन की गली स
हर तरफ से हो रही थी रंगों की बौछारे
एक रंग बचपन की यादों से निकल
एक यौवन की बातों स
एक रंग टूटे दिल से निकला
एक यारों की बाँहों स
एक बुरे की सोहबत से
एक रंग निकला मुहब्बत से
एक कटोरे में बैठे शनि के तेल की धार से
एक रंग निकला क्रोध की कटार स
एक मंदिर के दीये में दिखाई दिया
एक अजान में सुनाई दिया
एक धर्म की आड़ में था मुँह छुपाए
एक रंग सरहद पर दुश्मन के होश उड़ाए
एक मचला गोरी की चुनरिया प
एक मजनू की दोपहिया पर
एक गली में क्रिकेट खेलते बच्चों के बैट प
एक रंग अटका था टेनिस के नेट पर
एक स्तब्ध था अखबार में हत्या की खबर पर
एक रंग कुछ ढूँढ रहा था नौकरी के इश्तहार प
एक ग़ालिब के शेर से निकल
एक दोस्त के एसएमएस से
एक वैलेंटाइन डे पर फूलों से
एक रंग निकला बसंत के झूलों स
एक सुंदरता की स्पर्धा में रेम्प से
एक टीवी में सीरियल की वैम्प से
एक कत्थक की थाप में
एक सरगम की आलाप मे
एक फिल्मों के गानों से
एक ऊँचे मकानों से
एक गरीब की झोपड़ी से
एक शमशान में खोपड़ी स
एक गिरा शेयर मार्केट से धम्म से
एक आतंकवादी के बम से
एक सास-बहू की तकरार से
एक टाटा की नेनो कार स
एक धर्म की लड़ाई से
एक हलवाई की कड़ाही से
एक प्रेम की पतंग से
एक होली की उमंग स

जहाँ देखो वहाँ रंगों की बौछारें थीं
कैसे बच पाता इन सब से
इन रंगों में नहाकर जब घर से निकला
लोग पूछने लगे कहाँ से रंगाकर आए हो
मैंने कहा कहीं नहीं जीवन की गली तक गया थ
जितना बचता रहा, उतना ही रमता रहा..............
और भी
परिवर्तन
अपनी चोटी में बाँध लूँ दुनिया
लक्ष्य....
सी-सॉ
तुम्हारे सिवा
खाली रातें