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सदाचार सद्भाव खो गए...
- श्याम झँवर 'श्याम'
ND

ईश्वर में विश्वास बढ़ा है, जीवन में प्रतिघातों से
कुछ हमने भी सीख लिया है जीवन में संतापों से।

जीवन का उद्देश्य हो गया, भागो पैसे के पीछे
सुधरा नहीं एक भी अब तक, भाषण, मंचों, नारों से।

कैसे हैं संस्कार कहाँ है दोष समझ न पाए हम
दादा-दादी हुए तिरस्कृत, आज यहाँ परिवारों से।

हुए नहीं हैं बंद अभी भी, सब दरवाजे पुण्यों के
ईश्वर प्राप्त नहीं होते हैं, माला मनकों जापों से।

कुछ भी मिलता नहीं मुफ्त में दुनिया का दस्तूर यही
कुछ पाया है ठोकर से तो कुछ-कुछ मिला दुलारों से।

कोई नहीं समझ पाया है, ये दुनिया किस ओर चली
सदाचार सद्भाव खो गए, कर्मों और जुबानों से।

मन में हो संकल्प 'श्याम' तो कर सकते हो कुछ भी तुम
कोई फर्क नहीं पड़ता है दुनिया के अंगारों से।
और भी
ख़ामोशी...
माँ
प्रतीक्षा
अस्तित्‍व
जान से प्यारा
मेरे सपने..