- सुरेंद्र कुमार 'सुमन' माँ मैं साथ तुम्हारे ही रह जाता जीवनके प्रवाहसंग साथ नहीं बह जाता
माँ मुझे जब घेरते गहन सघन अंधेरे मेरी आशा की किरणों पर मेघ डालते डेरे माँ जब मनोबल मेरा क्षीण-क्षीण हो जाता खोया हुआ विश्वास दृढ़ खोज नहीं मैं पाता
तब कहीं से सहसा तू आती कैसा अटूट ये नाता माँ मैं साथ तुम्हारे ही रह जाता
माँ तेरे तप की गाथा मैं गढ़ नहीं हूँ सकता तेरी करूणा का सागर जल भर नहीं मैं सकता माँ फिर भी तुमको कितना सादा ही हूँ पाता तेरे त्याग कर्म का मोती पिरोया नहीं है जाता
ये कैसा आभास है माँ, जो रह रहकर आ जाता माँ मैं साथ तुम्हारे ही रह जाता।
माँ मैं तेरे साथ संग को मचल-मचल जाता हूँ देख यहाँ पर रोटी भी तो अकेले ही खाता हूँ माँ मेरे बिन अवस्था तेरी भी ऐसी ही तो होती थी बाट मेरी जोह-जोह कर जब तू बिन भोजन सोती थी।
बेसन की सौंधी रोटी का स्वाद तुझे बहुत ही भाता माँ मैं साथ तुम्हारे ही रह जाता।
माँ जब विवशता की निशा का रंग निशा हो जाता तब तेरी पावस स्मृति दीपक सुखद अहसास जगाता माँ जीवन के अनंत महासागर में मैं बहुत अकेला मरूस्थल बने इस जीवन समर में माया जाल है फैला
मैं अभागा सुख न दे पाया, पर ये जनम-जनम का नाता काश मैं साथ तुम्हारे ही रह जाता जीवन के प्रवाह संग साथ नहीं बह जाता।
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