भूत से मिलने का तीनों का इरादा अभी बदला नहीं था बल्कि अब तो उनके पास भूत से बचने के लिए हनुमान चालीसा जैसा रक्षा कवच भी था। चंदू ने हनुमान चालीसा याद कर लिया। वह रटने में वैसे भी माहिर था। गुल्लू और हमीद सिर्फ गणित के सवाल ही रट पाते और ऐन मौके पर रटे हुए में गड़बड़ की आशंका रहती थी। तो हनुमान चालीसा रटने का काम चंदू ने किया। दो दिन इस तरह निकल गए और भूत के बारे में और तरह-तरह की जानकारियाँ तीनों ने इकट्ठा कर ली। जैसे भूत को आगरे का पेठा बहुत पसंद है। इसके पीछे एक पूरी घटना थी।
एक बार मिश्रीलाल हलवाई आगरा से एक टोकनी पेठा लेकर आ रहा था। रात को आने में देर हो गई और वह इमली के यहाँ से गुजरा। घर पहुँचा तो टोकनी खाली थी। मिश्रीलाल हलवाई का कहना था कि हो न हो इमली वाले भूत ने ही पेठे निकाल लिए। तभी तो उन्हें खबर तक नहीं हुई। तीनों को यह बात सुनकर खूब हँसी भी आई कि भूत को भी आगरे का पेठा पसंद है।
दो दिनों बाद गुल्लू ने बताया कि आज रात को वे तीनों छत पर इकट्ठा सो सकते हैं। मम्मी से मैंने पूछ लिया है। तीनों खुश हो गए। भूत से मिलने का मौका आ गया था। भूत देखने की उत्सुकता लिए तीनों उस रात छत पर इकट्ठा हुए। पहले कुछ देर इधर-उधर की बातें की। भूत दिखते ही चुपचाप हो जाना है। भूत की तरफ अँगुली नहीं दिखाना है वरना हमारा चेहरा उसकी आँखों में छप जाएगा। इस तरह की सतर्कता बरतने वाली बातों को ध्यान में रखा गया।
रात को गाँव की जेल में पहरेदार ने १२ बजे के घंटे बजाए तो तीनों सावधान हो गए। चुपके से एक चादर ओढ़कर तीनों छत की मुंडेर के करीब आए और इमली की तरफ देखने लगे। इमली के पेड़ पर कुछ कुछ सफेद रंग का कपड़ा दिख रहा है। गुल्लू ने चंदू का हाथ दबाते हुए कहा देखो वो रहा भूत। चंदू और हमीद के हाथ-पैर काँपने लगे। चंदू ने धीमे स्वर में हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया।
गुल्लू ने धीरे से कहा देखा मैं न कहता था कि छत से इमली वाला भूत दिखता है। हमीद ने कहा धीरे बोलो कहीं उसने सुन लिया तो हम तीनों की खैर नहीं। सन्नाटा छा गया। भूत तो जहाँ था वहीं था सरकने का नाम नहीं ले रहा था। तीनों चाह रहे थे कि भूत का चेहरा या उसका कोई करतब भी दिखे पर ऐसा कुछ भी नहीं हो पा रहा था। तीनों चाह रहे थे कि भूत का चेहरा या उसका कोई करतब भी दिखे पर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था।
आधे घंटे तक भूत और ये तीनों एक ही जगह जमे रहे। भूत देखकर तीनों की नींद तो उड़ ही चुकी थी और अब नींद आना भी नहीं थी। तीनों ने एक-दूसरे के हाथ कसकर थाम लिए। तभी पीछे से आवाज आई क्या देख रहे हो? तीनों को जैसे करंट लगा हो। तीनों ने पीछे मुड़कर देखा तो गुल्लू के पापा खड़े थे। गुल्लू ने कहा - पापा इमली पर भूत है। पापा ने कहा - क्या कह रहे हो? कैसा भूत? गुल्लू के पापा के आने से तीनों में थोड़ी हिम्मत आ गई थी। अब तीनों ने इमली की तरफ इशारा करते हुए कहा वह देखिए वह रहा।
गुल्लू के पापा ने इमली की तरफ देखा। इमली थोड़ी दूर थी और इसलिए साफ नजर नहीं आ रहा था। कुछ-कुछ सफेद जरूर नजर आ रहा था। गुल्लू के पापा ने गुल्लू से कहा कि नीचे से टार्च तो ले आओ। गुल्लू जाकर टार्च ले आया। गुल्लू के पापा ने इमली पर टार्चस से रोशनी की तो देखा कि एक बड़ी से सफेद पन्नी इमली की टहनियों में अटकी है और उससे ऐसा लग रहा है मानो इमली पर सफेद कुर्ता पहने कोई बैठा हो। पापा ने तीनों बच्चों से कहा देखो यह तो सिर्फ एक पॉलिथीन है।
फिर उन्होंने तीनों बच्चों से कहा कि असल में भूत होता ही नहीं है।
चंदू ने कहा पर अंकल घनश्याम पान वाले ने तो भूत देखा। गुल्लू के पापा ने कहा कि जिस तरह तुमने पॉलिथीन को भूत समझ लिया उसने भी ऐसे ही बनने वाली किसी आकृति से डरकर वहम पाल लिया होगा। आज तक किसी ने भी भूत नहीं देखा। सब इधर-उधर की बातें करते रहते हैं। वैसे भी भूत सिर्फ बुरा काम करने वालों को दिखता है, अच्छे बच्चों को भूत कभी नहीं डराता। इन सारी बातों में डेढ़ बज गया और फिर गुल्लू के पापा ने कहा कि अब तीनों सो जाओ। और छत पर भूत से डर तो नहीं लगेगा? तीनों ने एक साथ कहा - जब भूत ही नहीं है तो डर कैसा। उसके बाद तीनों ने जबभी किसी से भूत की बातें सुनी तो मन ही मन खूब हँसे। |