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शिबू की समझदारी
टिल्लू चाचा

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शिबू आज सबसे नाराज था। रिजल्ट आए अब एक सप्ताह हो गया था और उसकी नई साइकिल अभी तक नहीं आई थी। शिबू को दो साल पहले छठी क्लास में जो साइकिल दिलाई गई थी उसे लगता था कि अब वह पुरानी हो गई है और उसके पास नई साइकिल होनी चाहिए। बिल्कुल वैसी ही जैसी शुभम के पास थी। और इस साइकिल के लिए ही तो उसने इस बार खूब मेहनत की और 8वीं की परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक लाकर क्लास में दूसरा स्थान प्राप्त किया। क्लास में उससे आगे अप्पन था जिसके 94 प्रतिशत अंक आए थे।

अप्पन की तरफ किसी का ज्यादा नहीं था क्योंकि वह तो हर बार क्लास में पहले नंबर पर ही आता था पर चौंकाने वाली बात तो शिबू का 92 प्रतिशत प्राप्त करना था। क्योंकि शिबू बड़ी मुश्किल से फर्स्ट क्लास के नंबर तक पहुँचता था। एक बार तो शिबू की क्लास टीचर राशिदा मैडम को भी यकीन नहीं हुआ कि शिबू इतने अच्छे नंबर ला सकता है।

शिबू के दोस्त तो उससे काफी नाराज थे क्योंकि उन्हें घर पर नसीहत दी जा रही थी। पापा ने कहा कि शिबू की साइकिल वैसे भी ज्यादा पुरानी नहीं हुई है। पर शिबू का कहना था कि उसे शुभम जैसी ही साइकिल चाहिए। और उसकी साइकिल में कहाँ खूब सारे पैसे लगने वाले हैं। नई साइकिल न आने से वह आज से नाराज था। पापा ने जब साइकिल न आने का कारण शिबू को बताया तो उसे लगा कि उसकी साइकिल कुछ दिन और अटक गई है। बस फिर क्या था शिबू पापा से नाराज हो गया।

रोज सुबह उठकर अखबार पढ़ना और बगीचे में साफ-सफाई वाले अपने रोज के काम भी शिबू ने अगले दिन नहीं किए। आखिर जो नाराज होते हैं उन्हें बताना भी तो पड़ता है कि वे नाराज हैं। शिबू ने अपनी पुरानी साइकिल को भी पिछले दिनों से साफ करना बंद कर दिया था क्योंकि अब उसका सारा ध्यान नई साइकिल पर था। पुरानी साइकिल घर के कोने में खड़ी थी। साइकिल ज्यादा पुरानी भी नहीं थी पर बस अब वह शिबू को अच्छी नहीं लग रही थी।

शिबू ने अपने रोज के काम करने बंद करके घर के सदस्यों को जता दिया कि नई साइकिल न आने से वह नाराज है। शिबू ने पिछले दिनों घर के पास शुरू हुए ग्रीष्मकालीन शिविर में जाना भी शुरू किया था पर आज नाराजी के चलते वह वहाँ भी नहीं गया। पूरा दिन शिबू ने घर में किसी से बात नहीं की। आठवें दिन के बाद नौवाँ दिन भी पूरा बीत गया और साइकिल का वादा अब भी वादा ही था।

शिबू सोच रहा था कि वह अपने दोस्तों को भी कह चुका है कि अब उसे नई साइकिल मिलने वाली है और अगर साइकिल नहीं मिलती है तो सारे दोस्त उस पर हँसेंगे। अपनी नाराजगी जताने के लिए शिबू ने टीवी देखना बंद कर दिया ताकि सभी को लगे कि वह नाराज है पर शिबू से दादी और मम्मी ने एक-दो बार पूछा ‍और फिर उसे समझाइश देकर अपने काम में लग गई।

शिबू के पापा को पता था कि साइकिल नहीं आने से शिबू नाराज है पर उनकी जेब इस महीने तंग थी और इसलिए वे बेटे को नई साइकिल चाहकर भी नहीं दिला पा रहे थे। शिबू नाराजी में दिनभर चुपचाप खेलकर वापस आता और खाना खाकर चुपचाप सोने के लिए चला जाता। फुटबॉल खेलने जाते ही वह दिनभर में थोड़ा खुश रहता था। बाकी समय वह घर में उखड़ा-उखड़ा रहने लगा। साइकिल उसके दिमाग में घूमती-रहती। शिबू कुछ दिनों पहले तक तो सुबह-सुबह अपनी साइकिल पर घर के कुछ छोटे-मोटे काम भी कर दिया करता था पर अब तो पुरानी साइकिल खोने में खड़ी इंतजार ही कर रही थी कि कोई उस पर से धूल साफ करे। शिबू ने तय किया था कि अब वह पुरानी साइकिल को हाथ नहीं लगाएगा। उसे नई साइकिल चाहिए।

जब नई साइकिल आए बिना दसवाँ दिन भी बीत गया तो शिबू ने सोचा कि इस तरह दिनभर घर पर बैठने से तो वह बोर होता रहेगा। अपनी नाराजगी जताने के लिए घर पर तो वह टीवी भी नहीं देखता है तो क्यों न दिन में वह अपने दोस्तों के घर जाकर उनसे मिल आए। देखे कि वे क्या कर रहे हैं। यह सोचकर शिबू पड़ोस में रहने वाले सिद्धार्थ के घर पहुँच गया। सिद्धार्थ उस समय अपने पुराने जूतों की दो जोड़ी ठीक करवाने के लिए मोची के पास ले जा रहा था। शिबू भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में दोनों बातचीत करने लगे।
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