दीपावली देबराय" एक उभरते हुए कलाकार के लिए!" बिशु काका बोले। झुमका ने उस सुंदर नीले रंग के डिब्बे की ओर देखा, जो उसके बिशु काका ने अभी-अभी उसे उपहार में दिया था। रंगों का वह डिब्बा उस मशहूर कंपनी का था जो चित्रकला से संबंधित सामान बनाने के लिए विश्व-स्तर पर सबसे बेहतरीन मानी जाती थी। झुमका के बिशु काका को अपनी कंपनी की तरफ से विदेश भेजा गया था। काका विदेश से अपने भतीजे-भतीजियों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर लौटे थे। रंजू के लिए शतरंज का सेट, टुबलू के लिए रेलगाड़ी, शुभा के लिए पोनीटेल वाली गुड़िया और भी न जाने क्या-क्या उपहार वे लाए थे। झुमका के लिए रंगों का यह डिब्बा था। "कितना सुंदर है यह?" माँ उत्साहित होकर बोली, "इससे प्यारा रंगों का डिब्बा मैंने पहले कभी नहीं देखा था।" डिब्बा सचमुच खूबसूरत था। इससे पहले उसके पास रंगों के जितने डिब्बे थे, उनमें साधारणतः नीले, भूरे और लाल रंग ही होते थे। लेकिन इस डिब्बे की सूची में तो इन रंगों के नामों की जगह अल्ट्रामेरीन, बर्न्ट सिएना और स्कारलेट लिखा था। यह डिब्बा था ही ऐसा कि किसी भी चित्रकार बच्चे को मिलता तो वह बहुत ही प्रसन्न होता। जब बिशु काका अपनी विदेश-यात्रा के किस्से सुनाने में मस्त हुए, झुमका धीरे से वहाँ से चली आई। एक और रंगों का डिब्बा! झुमका उदास हो गई। क्या कोई भी नहीं समझ पाता कि उसे रंगों के बजाय एक गुड़िया चाहिए? उसे तो बस एक गुड़िया चाहिए।झुमका ने जब से हाथ में पेंसिल या ब्रश को सीधा पकड़ना सीखा था, तभी से उसे ड्राइंग और पेंटिंग का बहुत शौक रहा। उसके अंदर यह प्रतिभा थी और सब लोग भी ऐसा ही मानते थे। जब वह बहुत छोटी थी, तब भी वह इतने आकर्षक चित्र बना लेती थी कि उन्हें पोस्टर की तरह चिपका लिया जाता या टाँग लिया जाता। उसकी माँ ने इसीलिए थर्माकोल का एक बोर्ड लॉबी में लगा दिया था। इस बोर्ड पर वह उन सभी पेंटिंगों और स्केचों को लगा दिया करती, जिन्हें झुमका लगभग रोज ही बनाती थी। आने-जाने वाले उस बोर्ड पर लगी तस्वीरों को देखते और झुमका की प्रशंसा करते व उसे प्रोत्साहन देते। उनके घर में आने वाले रिश्तेदार उनकी बनाई तस्वीरों को घर में या ऑफिस में सजाने के लिए माँगकर ले जाते। एक बार झुमका बिशु काका के ऑफिस गई थी। उसने देखा कि काका ने उसके बनाए स्केच अपनी मेज के शीशे के नीचे लगा रखे थे। यह देखकर वह बहुत खुश हुई थी। " झुमका सचमुच कलाकार है," झुमका के माता-पिता, उनके पड़ोसी, रिश्तेदार सभी कहते- "झुमका को बढ़ावा देना चाहिए।" झुमका को प्रोत्साहित करने के लिए हर कोई उसे रंगों के डिब्बे, पोस्टर-कलर, ड्राइंग के कागज व पेंट-ब्रश, कलर-प्लेट और ईजॅल देते थे। नया साल हो या जन्मदिन, दीपावली हो या अन्य कोई त्योहार, या त्योहार न भी हो तो झुमका को बस चित्र बनाने का ही सामान मिलता। उसकी गीता आंटी ने तो उसे कला के इतिहास पर एक बहुत मोटी पुस्तक ही दे डाली थी, "हिस्ट्री ऑफ आर्ट"। इस किताब में ढेर सारे चित्र थे, और बहुत-से ऐसे शब्द जिन्हें झुमका कभी समझ न पाई। " मैं शायद ठीक नहीं कर रही, झुमका खुद से कहती, "लेकिन कभी-कभी मेरी भी तो इच्छा होती है कि कोई मुझे पेंटिंग के सामान की जगह कुछ और दे। यह रंगों का डिब्बा कितना प्यारा है, लेकिन काश, बिशु काका इस डिब्बे को शुभा को दे देते और मुझे उसकी वाली गुड़िया। " "मैं गुड़िया को तरह-तरह के कपड़े पहनाती, उसके बाल सँवारती और उसका घर बनाती, उसमें गुड़िया का ढेर सारा फर्नीचर रखती तो कितना मजा आता।" झुमका थोड़ी देर बाद अपनी बहन से बोली-"शुभा, तुम मेरा रंगों का डिब्बा ले लो। इसके बदले में मुझे अपने गुड़िया दे दो ना!" "बिलकुल नहीं," शुभा ने झुमका के हाथों से गुड़िया छीनते हुए कहा- "गुड़िया मेरी है, बिशु काका इसे मेरे लिए लाए हैं।"हाँ, लेकिन तुम्हारे पास तो पहले से ही बहुत सारी गुड़िया हैं। और उस दिन तुम भी तो मेरे रंगों से खेल रही थीं। क्यों न हम अपने उपहार बदल लें?" |