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रूठों को मनाना जरूरी
दो भाई थे। पिता के मरने के बाद दोनों एक साथ ही रहते थे। बड़ा-सा घर था जिसके एक हिस्से में छोटा भाई और दूसरे हिस्से में बड़ा भाई रहता था। मकान के आगे एक बड़ा सा बाड़ा था। बाड़े के बीच में एक छोटी-सी दीवार थी जो दोनों के मकानों को अलग करती थी। उस बाड़े में आते-जाते दोनों एक-दूसरे से बातें करते और इस तरह मुलाकात दिन में कई बार हो जाती थी।

दोनों ने पिताजी के व्यापार और खेती के काम को आपस में बाँट लिया था। एक बार दोनों भाइयों में किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया। दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। दोनों एक-दूसरे का मुँह देखने को भी तैयार नहीं थे।

एक बार बड़ा भाई व्यापार के काम से कहीं जाने को था कि तभी एक मिस्त्री ने आकर कहा कि मैं बेरोजगार हूँ क्या कुछ काम मिलेगा। बड़े भाई ने कुछ सोचकर कहा कि एक काम है अगर तुम कर सको। मिस्त्री बोला- मैं हर काम कर सकता हूँ। बड़ा भाई बोला कि वह बाड़ा देखते हो। उसके बीचोंबीच जो छोटी दीवार है उसे 8 फुट की कर दो क्योंकि मैं अपने भाई का चेहरा भी नहीं देखना चाहता हूँ।

मिस्त्री ने कहा- शाम तक आपका काम हो जाएगा। बड़ा भाई अपने काम से बाजार चला गया। शाम को जब वह लौटा तो मिस्त्री नेअपना काम पूरा कर लिया था। बड़े भाई को देखकर हैरानी हुई कि मिस्त्री ने दीवार को बड़ा करने के बजाय छोटी दीवार के ऊपर एक बढ़िया रास्ता बना दिया था ताकि इधर से उधर आसानी से आना-जाना हो सके।

बड़े भाई ने गुस्से में मिस्त्री से कहा- यह तुमने क्या किया? मिस्त्री ने बड़े भाई को जवाब दिया- आपस की लड़ाई एक-दूसरे से दूर जाकर नहीं सुलझाई जा सकती है बल्कि उसे सुलझाने के लिए एक-दूसरे के पास आना होता है। बड़े भाई के समझ में बात आ गई और उसने तुरंत जाकर छोटे भाई से बातचीत शुरू कर दी। छोटे ने भी अपनी गलती मानी और बड़े से माफी माँग ली। आप भी अगर अपने दोस्तों से रूठे हो तो सुन लो कि बातचीत से सारे झगड़े सुलझ जाते हैं।'
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