बगीचे को पानी देने वाला सिप्रंकलर देखते रहना मंजरी को बड़ा पसंद था। वह ठुमकते हुए गोल-गोल घूमकर दूर-पास और बीच के पौधों पर पानी की बूँदें छिटकता था। गुडहल, हॉलीहॉक के फूलों, हरी दूब और उसके घेरे में आने वाले हर किसी को वह रह-रहकर तरबतर करता रहता। कुछ छींटे शहतूत की डाली पर टकराकर उनकी फुहार गुंजा के कमरे में भी आती।
खिड़की के पास बैठकर पढ़ाई करने वाली गुंजा हर डेढ़ मिनट बाद पुस्तक बंद कर बाहर ताकने लगती। पहले वह पुस्तक को गीली होने से बचाने के लिए ऐसा करती फिर फुहार में भीगने का आनंद लेने के लिए ऐसा करने लगी। हर थोड़ी देर बाद सिप्रंकलर छक-छक करते, फुहार उड़ाते हुए आता और आगे निकल जाता। सिप्रंकलर में जानबूझकर भीगने वाली वह अकेली ही नहीं थी।
झुमरू के गीले पंजों और बालों में अटके सूखे पत्तों से गुंजा को अंदाजा था कि सारा समय रसोईघर में मम्मी के आसपास डोलने वाला पेटू पिल्ला आधा घंटा कहाँ गायब रहता है। बगीचे की बागड़ में फुदकने वाले छोटे पक्षी और श्यामा चिड़िया फुहारों में जमकर नहाते। ढीठ बुलबुल सिप्रंकलर के ठीक ऊपर जा बैठती। नीम के तने पर पसर कर धूप सेंकती गिलहरी पहले तो अनजान बनी रहती फिर पानी के छींटें खाते ही चमक उठती।
तितलियाँ, मधुमक्खियाँ, गिरगिट... गुंजा को विश्वास था कि ऐसे कई प्राणी, जिनका उसे पता भी नहीं है फव्वारे का मजा लूट रहे होंगे। चाहकर भी वह उस समय बगीचे में नहीं जा पाती। कभी वह स्कूल जाने की तैयारी में रहती तो कभी परीक्षा की पढ़ाई में, तो कभी उसे होमवर्क पूरा करना होता।
आज गर्मी की छुट्टी का पहला दिन था और आज का कार्यक्रम गुंजा ने हफ्तों पहले से तय कर रखा था। मम्मी ने सोचा था कि आज लड़की देर तक सोती रहेगी। लेकिन गुंजा जल्दी तो उठी ही, नहा कर अपना नाश्ता ट्रे में सजा कर बगीचे में निकल गई। उसने सोच रखा था कि रोज बगीचे में बैठकर नेचर डायरी लिखा करेगी। पहले उसने बगीचे के पेड़ों और खिलने वाले पौधों के बारे में लिखा। फिर पक्षियों, गिलहरियों, गिरगिटों, मधुमक्खी-भौंरों का परिचय लिखा।
ठंडी मिट्टी में दुबके दो मेंढ़क भी उसे मिले। अब वह लंबी घास और झुरमुटों में ताक-झाँक कर रही थी कि अचानक सूखे पत्तों के ढेर में कुछ आहट सुनाई दी। शायद झुमरू है। उसकी आदत है छछूंदरों की टोह लेते हुए उनके बिलों में नाक धँसाने की। तभी तो पत्तों के ऊपर उसकी दुम दिखाई दे रही थी। गुंजा ने झुमरू की दुम पकड़ी और झटके से बाहर खींच निकाली। ऊँई ऽऽ एक पतली-सी आवाज निकली। गुंजा चौंक पड़ी क्योंकि यह लड़की की आवाज उसकी नहीं, उसके हाथ में आए एक जीव की थी। यह गुड़िया है या कोई खिलौना? ध्यान से देखने पर गुंजा की समझ में आया कि यह एक परी है। उसकी बाँहों पर चमकदारपंख भी लगे हुए थे। परी गुंजा को जानती थी क्योंकि वह रोज फव्वारे में नहाने के लिए बगीचे में आती थी और गुंजा को पढ़ते हुए देखकर प्रशंसा से भर जाती थी। बिना उससे डरे परी ने गुंजा का नाम लेकर कहा कि तुमने मुझे पकड़ लिया है इसलिए तुम्हारी तीन इच्छाएँमुझे पूरी करनी है। बताओ क्या चाहती हो?
परियों की बात पर किसे विश्वास होगा? पहले तो गुंजा को भी नहीं हुआ। परंतु परी तो उसके हाथ में थी। यह सब इतना अनोखा था कि काफी देर तक गुंजा को भान भी नहीं रहा कि परी उसके हाथ में उल्टी लटक रही है। समझ में तब आया जब परी ने कहा कि तुमने मुझे उल्टा पकड़ रखा है इसलिए जादू भी उल्टा चलेगा। तुम चाहोगे उसका ठीक उल्टा होगा। इच्छा सोच समझ कर करना। गुड-डे कहकर परी उसके हाथों से फिसल कर उड़ गई।
गुंजा चकित थी और इस अनहोनी से उत्तेजित भी। सारी बात किसी को बताने के लिए वह बेहद उतावली हो रही थी। पड़ोस के बंगले में उसकी पक्की सहेली टुलटुल रहती थी। वह भी सुबह से गुंजा को कुछ बताने के लिए अधीर हो रही थी। गुंजा को बगीचे में देखकर टुलटुल दौड़कर आई और उत्साहित होकर बोली कि आज वह इडलियाँ बनाने वाली है। उनके घर में आज पहली बार दक्षिण भारतीय व्यंजन बनने जा रहा था।
गुंजा को इडली पसंद थी। वह बोली, मैं चाहती हूँ कि... तभी उसके ध्यान में आया कि ये शब्द बोलते ही परी का जादू चालू होचुका होगा। उसे सोच-समझकर, जो चाहती है उसका उल्टा बोलना है। टुलटुल ले इसलिए गुंजा ने धीमे से आगे कहा... तुम्हारी इडलियाँ बेस्वाद और पत्थर की तरह कड़क बने। टुलटुल ने फिर भी सुन लिया। उसे यकीन ही नहीं हुआ कि उसकी अच्छी सहेली उसका इतना बुरा चाहसकती है। उसकी आँखें छलछला उठीं। बिना कुछ बोले टुलटुल भागकर अपने घर चली गई। टुलटुल ने गुंजा को अपना राज बताने का कोई समय नहीं दिया। अब उसे समझाना भी आसान नहीं था।
यह किस्सा अप्पू को बताने में कोई मतलब नहीं था। एक तो अप्पू उसकी सभी बातें सुनकर अनसुनी कर देता था। दूसरे वह अभी पोकेमान गुब्बारे से खेलने में लगा था। अभी कुछ दिन पहले उसे किसी एसएमएस पर कहीं से पोकेमान का बड़ा सा गुब्बारा हाथ लगा था। दिन-रात वहउसी से खेलता रहता। अचानक हवा का एक तेज झोंका आया और अप्पू के हाथ से गुब्बारा छूटकर आकाश में उड़ने लगा। अप्पू का चीखना-चिल्लाना सुनकर मम्मी दौड़ते हुए बाहर आ गई। अपने ही खयालों में खोई गुंजा को कुछ ध्यान में नहीं आया।
गुंजा को निठल्ला खड़ा देखकर मम्मी शोर मचाने लगी कि गुंजा कुछ करो। गुब्बारा अब काफी ऊपर जा चुका था। कोई भी उसे पकड़ नहीं सकता था। मम्मी की डाँट से बचने के लिए गुंजा ने अपनी दूसरी इच्छा का तीर भी चला दिया- मैं चाहती हूँ कि गुब्बारा दूर उड़ जाए और कभी अप्पू के हाथ न लगे। इतना सुनना था कि अप्पू जमीन पर लोट लगाकर रोने लगा और मम्मी आगबबूला होकर गुंजा पर बरस पड़ी। बड़ी बहन होकर भी तुम छोटे भाई से ईर्ष्या रखती हो... तुम्हें शर्म आनी चाहिए... वगैरा-वगैरा।
उसी समय गुब्बारा लौट आने से अप्पू की किलकारी नहीं फूटती तो चपत लगाने की नीयत से मम्मी ने गुंजा की चोटी पकड़ ही ली थी। अच्छी भली सुबह और परी के वरदानों की मिट्टी पलीद हो चुकी थी। न वह किसी को अपनी अनोखी आपबीती सुना पाई थी न जादुई इच्छा से वह गुड़िया पा सकी थी जिसे उसने शहर के नए मॉल में देखा था। उल्टे दूसरों का मन दुखा दिया था सो अलग। सिप्रंकलर बंद हो चुका था। अपनी नेचर डायरी में फूलों की पंखुड़ियाँ दबाते हुए गुंजा ने भारी मन से अपनी तीसरी इच्छा भी न्यौछावर कर दी- मैं चाहती हूँ कि सबका मनमुटाव हो जाए।
उधर सुबकती हुई टुलटुल को उसकी मम्मी समझा रही थी। गुंजा उसकी पक्की सहेली है। वह उसका बुरा थोड़े ही चाहेगी। फिर उन्हें खिड़की में से उदास बैठी गुंजा नजर आई। उन्होंने गुंजा को आवाज ही कि वह उनके घर आकर अपनी सहेली को इडली बनाना सिखाए। गुंजा ने दौड़ कर यह मौका झपट लिया। परी के जादू से इडलियाँ इतनी बेहतरीन बन पड़ी कि माछ-भात को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले सांभर-चटनी से सनी उँगलियाँ चाटकर भालो-भालो करने लगे।
गुंजा अपने घर पहुँचे इसके पहले ही घोष आँटी ने फोन करके उसकी तारीफ के पुल बाँध दिए। इधर गुंजा की मम्मी का गुस्सा भी ठंडा हो चुका था। बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा कि छुट्टी लगने के बाद भी मेरी बेटी बायलॉजी की पढ़ाई में लग गई। एक दिन बड़ी डॉक्टर बनेगी। अप्पू इतना चिबल्ला है कि सारा दिन खेल करता रहता है। सच ही गुब्बारा उड़ जाता तो अच्छा होता। गुंजा ने अप्पू का भला ही चाहा था। आज मैं उसे वही मॉल वाली सुंदर गुड़िया ला देने वाली हूँ। गुंजा को लगा कि उसको भी परियों जैसे पंख निकल आए हैं।
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