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माँ का मंत्र
रोमा एक छोटी प्यारी बच्ची थी। उसे खाना बनाने का बहुत शौक था। जब भी माँ खाना बनाती तो वह चुपके से जाकर देखती कि क्यों माँ का बनाया खाना इतना स्वादिष्ट होता है कि पिताजी उँगलियाँ चाटते रह जाते हैं। और जो भी बाहर से खाने पर आता है वह तारीफ के पुल बाँध देता है।

रोमा देखती थी कि माँ के पास एक डिब्बा है। हर बार जब माँ खाना बनाती है तो डिब्बे में से कुछ निकालकर जरूर डालती। रोमा को लगा कि हो न हो उस डिब्बे में ऐसी कोई चीज है जिसे खाने में मिलाते ही खाने का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। माँ वह डिब्बा बड़ी हिफाजत से संभालकर रखती थी।

रोमा ने माँ को यह भी कहते सुना था कि वह उन्हें डिब्बा उनकी माँ से मिला है। एक बार रोमा की माँ बीमार हो गई। रोमा ने हिम्मत करके कहा कि कोई बात नहीं अब माँ आराम करेगी और खाना वह बनाएगी।
  रोमा ने उसे देखा तो उस पर लिखा कि बेटी तुम जो भी चीज बनाओं, उसमें एक चुटकी प्यार जरूर मिलाना ताकि वह चीज दूसरों को अच्छी लग सके। रोमा को बात समझते ज्यादा देर नहीं लगी। कितनी अच्छी बात भी है ना कि हमारे हर काम में थोड़ा सा प्यार शामिल है।      
जब रोमा किचन में खाना बनाने पहुँची तो खाने की पूरी तैयारी करने के बाद उसे ध्यान आया कि माँ हर डिश इसलिए खास बनती थी क्योंकि वह ऊपर रखे डिब्बे में से कुछ न कुछ डालती थी।


रोमा ने एक टेबल के ऊपर स्टूल जमाया और टाँड पर रखा वह डिब्बा उतार लिया। उसने स्टील का वह छोटा सा डिब्बा खोलकर देखा। डिब्बे में कुछ नहीं था। बस पुराने कागज की एक छोटी सी पर्ची रखी थी।

रोमा ने उसे देखा तो उस पर लिखा कि बेटी तुम जो भी चीज बनाओं, उसमें एक चुटकी प्यार जरूर मिलाना ताकि वह चीज दूसरों को अच्छी लग सके। रोमा को बात समझते ज्यादा देर नहीं लगी। कितनी अच्छी बात भी है ना कि हमारे हर काम में थोड़ा सा प्यार शामिल हो तो वह सामने वाले को जरूर प्रभावित करता है। प्यार हर मर्ज की दवा भी तो है।
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