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दोस्तो आज मैं आपसे इस बारे में बात करूँगी कि मेरा बचपन किस तरह का रहा। तो सबसे पहले अमृतसर शहर पर आते हैं, यहीं मेरा जन्म हुआ। इसके बाद मेरे बचपन के दिन लुधियाना में बीते। मैं घर में सबसे बड़ी थी पर खूब इधर-उधर मस्ती किया करती थी। बिना कहे आप समझ लो कि मैं अपने बचपन में बहुत शैतान थी। जब मैं कोई एक शैतानी खत्म करती तो तुरंत ही दूसरी के बारे में सोचना शुरू कर देती थी।

तुमने श्याम बेनेगल की "वेलकम टू सज्जनपुर" फिल्म देखी है क्या? इसमें मेरा किरदार जैसा दिखाया गया है वैसा रहना मुझे बहुत अच्छा लगता था। बचपन में मस्ती वाले कामों में मेरा दिमाग खूब चलता था। किसी-किसी को इस तरह का दिमाग गॉड-गिफ्टेड होती है। आपमें से भी कइयों के पास इस तरह के शैतानी वाले आइडियाज होंगे। इन दिनों में उन आइडियाज पर काम करके देखो।

मेरी पढ़ाई लुधियाना से ही हुई। मैं पहले सेक्रेड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ी और उसके बाद केम्ब्रिज स्कूल में। स्कूल के दिनों में मैं एक होनहार स्टूडेंट थी। हमेशा क्लास में अव्वल आती थी और जब मैं लुधियाना के गर्ल्स कॉलेज में पहुँची तो मुझे स्कॉलरशिप भी मिलती थी। पढ़ाई में टालमटोल करना मुझे ठीक नहीं लगता था और इसलिए मैं मन लगाकर पढ़ाई करती थी।

दोस्तो, मैं जिस परिवार से हूँ उसमें अधिकतर लोग डॉक्टर्स हैं। मैं भी अच्छी स्टूडेंट रही पर मुझे मेडिकल साइंस पढ़ने के बजाय हिन्दी फिल्मों ने अपनी तरतुमने श्याम बेनेगल की "वेलकम टू सज्जनपुर" फिल्म देखी है क्या? इसमें मेरा किरदार जैसा दिखाया गया है वैसा रहना मुझे बहुत अच्छा लगता था। बचपन में मस्ती वाले कामों में मेरा दिमाग खूब चलता था। किसी-किसी को इस तरह का दिमाग गॉड-गिफ्टेड होती है। आपमें से भी कइयों के पास इस तरह के शैतानी वाले आइडियाज होंगे।

इन दिनों में उन आइडियाज पर काम करके देखो। मेरी पढ़ाई लुधियाना से ही हुई। मैं पहले सेक्रेड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ी और उसके बाद केम्ब्रिज स्कूल में। स्कूल के दिनों में मैं एक होनहार स्टूडेंट थी। हमेशा क्लास में अव्वल आती थी और जब मैं लुधियाना के गर्ल्स कॉलेज में पहुँची तो मुझे स्कॉलरशिप भी मिलती थी। पढ़ाई में टालमटोल करना मुझे ठीक नहीं लगता था और इसलिए मैं मन लगाकर पढ़ाई करती थी।

दोस्तो, मैं जिस परिवार से हूँ उसमें अधिकतर लोग डॉक्टर्स हैं। मैं भी अच्छी स्टूडेंट रही पर मुझे मेडिकल साइंस पढ़ने के बजाय हिन्दी फिल्मों ने अपनी तरफ खींचा। मुझे एक्टिंग करना ज्यादा मजेदार काम लगा। शुरुआत से ही मेरे दिमाग में यह बात तय थी कि मुझे एक अच्छी अभिनेत्री बनना है। बचपन से ही मैं ड्रामा करने में माहिर थी। एक बार मेरी किसी शैतानी को लेकर मेरे माता-पिता मुझे डाँट रहे थे और तभी मैंने इस तरह की शक्ल बनाई जैसे मुझे बहुत डाँटा जा रहा हो। बस फिर क्या था डाँट की बजाय चॉकलेट मिल गई। ऐसा हर बार तो नहीं होता था पर कई बार यह ट्रिक चल जाती थी।

एक्टिंग की तो ऐसी और भी मजेदार यादें हैं। मुझे याद है कि जब मैं चार साल की थी तो एक बार स्कूल के एनुअल फंक्शन में मैंने अमिताभ बच्चन की मिमिक्री की थी। सारे दर्शक हँस-हँसकर लोटपोट हो गए थे। यह बात बाद में पापा-मम्मी बहुत से मिलने-जुलने वालों को सुनाते रहे।

दोस्तो, अभिनय के साथ मैंने अपने भाई के साथ भी बहुत अच्छे दिन बिताए हैं। चूँकि वह मुझसे छोटा था तो मैं उसे डाँटती भी खूब थी। वह मेरी बातें मान लेता था। कई बार हम दोनों के बीच "पिलो-फाइटिंग" भी होती थी। तो दोस्तो, इतनी बातें बताने के पीछे यही है कि आप भी इन दिनों में खूब अच्छी-अच्छी शैतानियाँ करो और अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान दो।

तुम्हारे बचपन में तुम सभी जो भी कुछ करोगे उसका प्रभाव तुम पर सारा जीवन रहेगा। इन दिनों के अच्छे काम बाद में बहुत याद आएँगे। तो दोस्तो, इस तरह के कामों को करने से ही तुम्हें तुम्हारी पसंद का रास्ता नजर आएगा। मैं तुम्हें यह भी बताना चाहूँगी कि वैसे तो जीवन में सब कुछ मजे में चलता है पर कभी-कभी मुश्किलें भी आती हैं। जैसे मुझे अभिनेत्री बनने के‍‍ लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ा। अनेक भूमिकाएँ कीं पर पहचान नहीं बनी, फिर वीरजारा फिल्म में मेरी भूमिका ने मुझे आप लोगों का खूब प्यार दिलाया। तो इस तरह रास्ता खुल गया।

तो आपके लिए भी रास्ता कुछ करने के बाद ही खुलेगा। तो हमेशा इस खञल जा सिमसिम वाली बात को याद रखना। चलते-चलते यह भी याद रखो कि मुझे गाँव के तौर-तरीके बहुत अच्छे लगते हैं। वहाँ रहने वाले लोगों की सच्चाई अच्छी लगती है। गाँव अच्‍छा लगता है।

वैसे ही जैसे वीरजारा में दिखाया गया है। मैं पंजाब की रहने वाली हूँ इसलिए भी ऐसे गाँव मुझे अपनी तरफ खींचते हैं। गाँव के साथ माँ के खाने से अच्‍छा मुझे कुछ भी नहीं लगा। माँ के हाथ का खाना दुनिया की सबसे अच्छी चीज है। मेरी बात से सहमत हो ना?

आपकी
दिव्या दत्ता
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