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असल में लगाओ चौके-छक्के, तो जानें  Search similar articles
बच्चों का दोस्त सौरव गांगुली
दोस्तो,

तुमने छुट्टियों में खूब मजे कर लिए। रिजल्ट आ गए और तुमने खुद के पास होने पर मिठाई भी खा ली। अब फिर से स्कूल जाने की बारी है। छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने का मजा ही कुछ और है। सारे दोस्त छुट्टियों की अलग-अलग बातें लेकर आते हैं और फिर एकदूसरे को सुनाते हैं। स्कूल में मैंने भी दोस्तों के साथ खूब गप ठोंकी है। तुम भी स्कूल जाओ तो अपने किस्से दोस्तों को सुनाना और हाँ, उनके किस्से भी मजे से सुनना।

प्यारे दोस्तो, तुम पढ़ाई करो या फिर क्रिकेट खेलो या फुटबॉल खेलो पर सिर्फ पढ़ाई करने के बजाय दूसरे कामों की तरफ भी ध्यान दो। अब देखो, मैं जब छोटा था तब सभी कहते थे कि यह लड़का पढ़ाई पर कम ध्यान देता है और इसका ध्यान खेलने में ज्यादा लगता है। पर क्या करूँ, खेलना तो मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है। पहले खेलता था तो डाँट पड़ती थी और अब खेलता हूँ तो सभी तालियाँ बजाते हैं।

दोस्तो, मैं घर में सबसे छोटा था। पापा चाहते थे कि मैं पढ़ाई में अव्वल आऊँ और अच्छी नौकरी करूँ पर मेरा ध्यान मेरे दादा पर लगा रहता था। दादा यानी बड़े भाई स्नेहाशीष पर। दादा अच्छा क्रिकेट खेलते थे और उनकी किट में हमेशा तैयार रहती थी। मुझे कोई क्रिकेट नहीं खेलने देता था तो मैंने दादा के सामान से ही क्रिकेट खेलना शुरू किया। मैं वैसे तो दाएँ हाथ से खेलता था पर दादाकी किट से खेलना था तो मैंने भी दादा की तरह बाएँ हाथ से बैटिंग करना शुरू कर दिया।

आज मैं बैटिंग बाएँ हाथ से और बॉलिंग सीधे हाथ से करता हूँ। इतना ही नहीं शुरुआत में तो मैं फुटबॉल खेलता था। स्कूल के दिनों में मैंने चार साल तक फुटबॉल खेली फिर एक दिन पापा ने क्रिकेट एकेडमी में दाखिला करवा दिया और तबसे क्रिकेट के साथ दोस्ती हो गई। दोस्तो, क्रिकेट खेलने के लिए हमें खूब प्रैक्टिस करना होती है। नेट्स पर खूब पसीना बहाना पड़ता है तब जाकर देश के लिए क्रिकेट खेलने का मौका मिलता है। टीवी पर मैच देखना और असल में मैच में चौके-छक्के लगाना अलग-अलग बात है। इसलिए बचपन से ही मुश्किल में रास्ता ढूँढते आना चाहिए। जैसे ऐन टेस्ट से पहले कॉपी गुम जाने पर तुम क्या करोगे। यही मुश्किल 10 गेंदों पर 22 रन बनाने में आती है। खैर दोनों ही जगह थोड़ा सा ध्यान देकर तुम रास्ता ढूँढ सकते हो।

दोस्तो, मैदान पर लगता है कि मैं बहुत गुस्सा करता हूँ पर असल में ऐसा नहीं है। मैं लोगों से अच्छे से बात करता हूँ और कभी किसी पर गुस्सा नहीं करता हूँ। मैदान पर थोड़ा बहुत गुस्सा सभी करते हैं और मैं भी करता हूँ। वैसे गुस्सा करना अच्छा भी है और बुरा भी। दोनों का फर्क तुम जानते ही हो। कभी-कभी इससेफायदा होता है तो कभी नुकसान भी। गुस्सा कब करना है और कब नहीं करना है यह तुम खूब समझते हो।

दोस्तो, मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ। मैं मंगलवार का उपवास भी करता हूँ और मंदिर भी जाता हूँ। मंदिर जाकर मैं ईश्वर से प्रॉमिस करता हूँ कि मैं अच्छा काम करने की कोशिश करूँगा। बस ईश्वर से खूब सारा नहीं माँगना चाहिए कि वह हमें पास करवा दे या फिर अच्छा क्रिकेटर बनवा दे। यह काम तो मेहनत से हमें ही करना होगा। ईश्वर उसमें मदद करते हैं पर ईश्वर बाहर नहीं हमारे अंदर ही होते हैं।

हम अच्छा काम करते हैं तो हमें जीत सामने दिखाई देती है। हमेशा जीतने की इच्छा रखो। कोई बात नहीं अगर कोई मैच हार जाते हो तो, पर जीतने की इच्छा रखना जरूरी है। खेल भावना का मतलब यह नहीं है कि दूसरे को जीतने दो। बल्कि उसका मतलब है कि तुम भी पूरी कोशिश करो और दूसरे को भी करने दो। फिर देखें कौन जीतता है।
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