अमर चित्र कथा | चिट्ठी-पत्री | कहानी | क्या तुम जानते हो? | प्रेरक व्यक्तित्व | कविता | अजब-गजब | हँसगुल्ले
मुख पृष्ठ » विविध » नन्ही दुनिया » कविता » भागा अंधकार देखो (Kids poem diwali)
Feedback Print Bookmark and Share
 
सूर्यकुमार पांडेय

मौसम धूम-धड़ाकों का,
उड़ते हुए पटाखों का।
लो, छूटा अनार देखा,
भागा अंधकार देखो।
माला जैसी लगती है,
दीपों की कतार देखो।
मौसम दीप जलाने का,
जी भर मौज उड़ाने का।
घर-घर में पकवान बने,
हैं ढेरों सामान बने।
हैं लक्ष्मी, गणेश दोनों,
शक्कर से भगवान बने।
मौसम लाई-खीलों का,
दीयों और कंदीलों का।
धूम मच रही बड़ी यहाँ,
लगी दीयों की लड़ी यहाँ।
अंधकार की हार हुई,
उड़ी आज फुलझड़ी यहाँ।
मौसम खील-बताशों का,
मौसम खेल तमाशों का।
सौजन्य से - देवपुत्र
संबंधित जानकारी खोजें