अब अमराई में आम डोले फुनगी पर देखो कोयल बोले भीनी खुशबू फैल गई है चिड़िया फुदकी हौले-हौले गुच्छे लटक रहे अब देखो मिल-जुलकर तुम नजरें फेंको
तोते ने भी चोंच मारी लगता धरती आँचल खोले हरे-भरे हैं आम रसीले खट्टे-मीठे कुछ हैं पीले लँगड़ा देसी कलमी आम बिट्टू-किट्टू का मन डोले
पेड़ हमें कितना कुछ देते बदले में हमसे ना लेते मीठे आम गटककर हम भी क्यों न सबसे मीठा बोलें। - कोमलसिंह चौहान, बीड़ (खंडवा)
|