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बात उन दिनों की है जब हम उन्नीसवीं सदी में प्रवेश कर रहे थे। जॉर्ज पार्कर नाम के टीचर अपने स्टूडेंट को पत्र-लेखन सिखाते थे। वे अपने काम के प्रति पूरी तरह से ईमानदार थे। जब वे अपने स्टूडेंट को पत्र-लेखन की बारीकियाँ सिखा रहे होते थे तो कई बार स्टूडेंटस के पेन से स्याही लीक हो जाती थी। उन दिनों चलने वाले पेन के साथ यह बड़ी समस्या थी। इससे जॉर्ज को बड़ी निराशा होती। स्याही के फैलने से कागज खराब हो जाता।

कपड़े पर भी स्याही लग जाती और लिखावट तो चौपट होती ही थी। अब ऐसे स्याही से पुते पत्र को कोई भी पाठक भला कैसे पढ़ता। जॉर्ज को अपने काम से प्रेम था और उसमें आने वाली हर मुसीबत को दूर करना उनके लिए जरूरी था। तो पेन के लीक होने की दिक्कत से छुटकारा पाने के लिए जॉर्ज ने कुछ औजार खरीदे और उनसे स्टूडेंट्स के पेन ठीक करना शुरू कर दिया। कुछेक पेन इस तरह ठीक किए, फिर जॉर्ज पर यह धुन कुछ ऐसी सवार हो गई कि उन्होंने एक ऐसा पेन बना डाला जिससे स्याही बिल्कुल लीक न हो सके।

जब जॉर्ज को लगा कि उन्होंने वाकई कमाल कर दिया है तो उन्होंने पेन बनाने की इस विधि का पेटेंट करवाया और इस तरह के पेन बड़े पैमाने पर बनाना शुरू किए। बहुत दिनों तक पेन की बिक्री के बाद किसी की सलाह पर जॉर्ज ने उन्हें अपना नाम दिया - 'पार्कर पेन'।

जॉर्ज पार्कर ने 1937 में दुनिया को अलविदा कहा। उनके बाद भी उनकी कंपनी का काम चल रहा है। उनकी कंपनी के बनाए पेन दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। पार्कर कंपनी में अब सभी तरह के पेन बनाए जाते हैं। उनकी कंपनी के बनाए पेन आज दुनिया भर में लोगों की जेब में इठलाते फिरते हैं।
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