मासिक ऋतु स्राव आमतौर पर 3-4 दिन तक होता है और औसतन 50 मि.ग्रा. मात्रा में प्रतिदिन निकलता है। यदि अधिक दिनों तक रजःस्राव होता रहे, अधिक मात्रा में होता रहे, तो इसे हिन्दी में रक्त प्रदर और अंगरेजी में मेनोरेजिया (सीर्हरिचयैच) कहते हैं।
दूषित रक्त के अधिक मात्रा में अधिक दिनों तक आने को आयुर्वेद में असृग्दर कहा जाता है। इस रोग से स्त्री शरीर का स्वास्थ्य गिर जाता है और शरीर दुर्बल हो जाता है। चाहे जब रजःस्राव होने लगे तो इसे मेट्रोरेजिया कहते हैं।
रक्त प्रदर रोग से ग्रस्त स्त्री को चक्कर आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, ज्यादा प्यास लगना, मुंह सूख जाना, नींद व आलस्य का अनुभव होना, शरीर में ऊष्णता का अनुभव होना, अति भोग-विलास करना व गर्भाशय में कोई गांठ या अन्य कोई विकार होना, पित्त का अत्यधिक कुपित होना, शरीर की तासीर अधिक गर्म होना, गर्भपात जैसी समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।
चिकित्सा * आँवले के बीजों की मिंगी को जल में पीसकर आधा कप पानी में घोलकर थोड़ी सी शक्कर मिलाकर 2-3 दिन पीने से उग्र रक्त प्रदर का भी नाश हो जाता है।
* गूलर का फल 20 ग्राम (जिनमें कीड़े न पड़े हों) को कूट-पीसकर 10 ग्राम शहद में मिलाकर प्रातःकाल चाटकर खाने से रक्त प्रदर ठीक होता है।
* कुक्कुटाण्डत्वक भस्म, प्रदरान्तक भस्म, बंगभस्म और चन्द्रकला रस, चारों 10-10 ग्राम, प्रवाल पिष्टी और शुभ्रा भस्म 5-5 ग्राम, सबको खरल में डालकर घुटाई करके अच्छी तरह मिला लें और बराबर वजन की 30 पुड़िया बना लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया शहद के साथ लें। भोजन के तुरंत बाद लोध्रासव, पत्रांगासव और अशोक सीरप तीनों 2-2 चम्मच आधा कप पानी में डालकर दोनों वक्त पिएं। रात को सोते समय शिलाजतु वटी और प्रदरारि रस 2-2 गोली दूध के साथ लें।
यह चिकित्सा 3-4 माह या लाभ न होने तक जारी रखें। दूर्वादि घृत में रूई का फाहा डुबोकर, फाहे में लंबा धागा बांध दें। सोने से पहले इसे योनि के अंदर सरकाकर रख लें, सुबह उठें तब धागा खींचकर इस फाहे को बाहर खींच लें व फेंक दें। यह उपाय रक्त प्रदर में बहुत कारगर सिद्ध हुआ है।
* 20 ग्राम अशोक की छाल दूध में डालकर खूब पकाएं, मसलकर यह योग सुबह-शाम सेवन करें जब तक कि रोग ठीक न हो जाए।
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